किताबों की दुनिया में कुछ लेखन का कार्य ऐसा भी है, जो कि हमें सीधे तौर पर समाज में रहने और उसकी हकीकत को समझने का रास्ता दिखाती है। सामाजिक असमानता, जातिवाद, लिंग भेद और उत्पीड़न के खिलाफ एक बाहरी और अंदरूनी चित्र भी प्रस्तुत करती है। आइए विस्तार से जानते हैं कि कैसे पुस्तकें समाज को समझने और बदलने की दिशा में गंभीर सोच विकसित करने में मदद करती है।
ज्योतिबा फुले की ‘गुलामगिरी’ किताब की समीक्षा

साल 1873 में ज्योतिबा फुले ने यह किताब भारत में सामाजिक अन्याय, जातिवाद और को देखते हुए तीखी आलोचना करते हुए लिखी। यह किताब केवल एक क्रांतिकारी ग्रंथ नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय को समझने का और उसका अनुसरण करने का जरिया भी बनती है। इस किताब को मूल रूप से मराठी में लिखा गया और फिर इसका अनुवाद हिंदी और अंग्रेजी में किया गया। यह किताब ज्योतिबा फुले ने अमेरिका के गुलामी-विरोधी आंदोलन के नेताओं को समर्पित किया है। फुले ने इस पुस्तक में यह बताया कि भारत में शूद्रों और अति-शूद्रों (आज के दलित) को ब्राह्मणों द्वारा किस तरह से मानसिक, सामाजिक और धार्मिक गुलामी में रखा गया है। वह इसे अफ्रीकी-अमेरिकियों की दासता से भी अधिक घातक मानते हैं, क्योंकि यह गुलामी धर्म और शास्त्रों के नाम पर थोपी गई है। खास तौर पर यह बताया है कि धर्म के नाम पर लोगों को गुलाम बनाना सबसे घिनौनी गुलामी है।फुले ने ब्राह्मण ग्रंथों — जैसे मनुस्मृति और पुराणों — की आलोचना करते हुए बताया कि उन्हें इस उद्देश्य से रचा गया कि समाज के एक बड़े वर्ग को हमेशा नीचा और अधीनस्थ बनाए रखा जाए।फुले का मानना था कि गुलामी केवल जाति तक सीमित नहीं है; महिलाएं भी इस सामाजिक ढांचे में दोहरी गुलामी झेल रही हैं — एक पितृसत्ता की और दूसरी जाति व्यवस्था की। कुल मिलाकर देखा जाए, तो यह किताब भारतीय इतिहास की पहली पुस्तकों में से एक थी, जिसने जातिवाद पर तर्क आधारित और वैचारिक हमला किया है। आप यह भी समझ सकते हैं कि बहुजन आंदोलन, दलित साहित्य और सामाजिक न्याय की राजनीति को इस पुस्तक ने विचारों का आधार दिया है। अगर आप भारत की जातिगत असमानता को समझना चाहते हैं, तो यह किताब आप पढ़ सकती हैं।
कांचा इलैया शेपर्ड की किताब ‘माँ: ज्ञान, व्यवस्था और सभ्यता का स्रोत’ की समीक्षा विस्तार से

लेखक कांचा की लिखी हुई गई यह किताब एक बेहद शक्तिशाली और भावनाओं से जुड़ी हुई है।यह किताब दलित-बहुजन वर्ग की महिलाओं और माताओं के ज्ञान, श्रम और योगदान को उचित स्थान दिलाने की मांग करती है। कांचा इलैया इस किताब में कहती हैं कि भारतीय इतिहास और संस्कृति में ज्ञान और सभ्यता की जो परिभाषाएं दी गई हैं। इसमें मातृत्व, घरेलू श्रम, खाना पकाने और कृषि में महिलाओं की भूमिका के साथ स्थानीय ज्ञान को भी विशेष जगह दी गई है। लेखक इस किताब के जरिए यह कहना चाहते हैं कि हमारी मां ने हमें जो ज्ञान दिया है, जीवन की जो सीख दी है, वो भी हमारे जीवन में सामाजिक न्याय को प्रस्तुत करते हैं। लेखक ने अपने निजी जीवन के अनुभव से यह दिखाया है कि कैसे दलित-बहुजन महिलाएं, जो घर और खेत में श्रम करती हैं, वो भी सामाजिक सभ्यता के निर्माण में खास भूमिका निभाती हैं। इस किताब में लेखक ने बताया है कि उनकी मां अशिक्षित थीं। लेकिन उनमें सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था की गहरी समझ थी। कुल मिलाकर यह किताब एक ऐसा चर्चा का विषय प्रस्तुत करती है कि मां केवल भावना नहीं है,बल्कि सामाजिक परिवर्तन की शक्ति बनकर सामने आती है। यदि आप दलित चेतना, स्त्रीवाद और समाज परिवर्तन में रुचि रखती हैं,तो यह पुस्तक आपके लिए अनिवार्य है। इस किताब को पढ़ने के बाद आप मां में ज्ञान को देखना शुरू करेंगे और उसे समझेंगे।
बी. आर. आंबेडकर की किताब ‘जाति का विनाश’ की समीक्षा विस्तार से

बी. आर. आंबेडकर द्वारा लिखी हुई यह किताब खासतौर पर हिंदू जाति व्यवस्था पर अब तक सबसे सटीक और क्रांतिकारी आलोचनाओं में से एक है। इस किताब का प्रकाशन साल 1936 में किया गया। डॅा. अंबेडकर की यह किताब जाति को भारतीय समाज की सबसे बड़ी बुराई के रूप में पहचानते हैं, और यह तर्क देते हैं कि जब तक जाति प्रणाली को खत्म नहीं किया जाएगा, तब तक समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे मूल्य केवल खोखले आदर्श बने रहेंगे। उन्होंने इस किताब में बताया है कि जाति केवल एक सामाजिक भेदभाव नहीं है, बल्कि यह एक तरह से नैतिक अपराध है। उन्होंने अपनी इस किताब में इस बात को साफ तौर पर लिखा है कि हिंदू धर्म और जाति व्यवस्था को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है। उनका यह कहना है कि जब तक लोग उन ग्रंथों को पवित्र मानते रहेंगे, जो जाति व्यवस्था को उचित ठहराते हैं, उस वक्त तक सामाजिक समानता एक सपना ही बनकर रह जाएगी। इस पुस्तक के प्रमुख विचार इस प्रकार यह है कि जाति व्यवस्था अमानवीय, धर्म को राजनीति में इस्तेमाल, समाज में नैतिकता की कमी, साथ ही समाज में क्रांति की जरूरत है। कुल मिलाकर देखा जाए, तो जाति व्यवस्था को कई प्रमुख जरियों के द्वारा इस किताब में बताया गया है। अगर आप भारतीय समाज की गहरी असमानताओं को समझना चाहती हैं, तो आप यह किताब पढ़ सकती हैं। साथ ही अगर आप यह समझ रहे हैं कि जाति अब खत्म हो चुकी है, तो यह पुस्तक आपको जरूर पढ़ना चाहिए।
ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘जूठन’ किताब की समीक्षा

यह पुस्तक न केवल एक व्यक्ति के अनुभवों को उजागर करती है, बल्कि एक पूरे वर्ग की संवेदना, संघर्ष, अपमान और आत्म-सम्मान की आवाज भी बन जाती है। साल 1997 में इसका प्रकाशन किया गया। इस किताब में जूठन का सही मायना बताया गया है। जूठन का अर्थ होता है कि किसी के खाने का बचा हुआ हिस्सा होना। लेखक ने इस किताब में बताया है कि उनका परिवार शादियों में बचा हुआ जूठा उठाकर अपने खाने का गुजारा करते थे। इसके साथ ही जातिगत गालियां, स्कूल में भेदभाव और श्रमिक जीवन में अपमान का सामना करते हैं। यह किताब बताती है कि जाति केवल विचार नहीं है और यह सिर्फ दलितों के लिए नहीं बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है, जो न्याय, समानता और मनुष्यता में विश्वास रखता है।
प्लेटो की किताब ‘द रिपब्लिक’ की समीक्षा विस्तार से
यह किताब न्याय, आत्मा, शिक्षा और आदर्श समाज पर गहराई से विचार करती है। लेखक के अनुसार एक व्यक्ति तभी न्यायपूर्ण हो सकता है, जब समाज न्यायपूर्ण हो। यह किताब आदर्श राज्य की कल्पना करता है। लेखक के अनुसार इस भौतिक संसार में जो कुछ हम देखते हैं, वह केवल छाया है। असली वास्तविकता दुनिया में है। आपको बता दें कि यह किताब राज्य, न्याय और शिक्षा की दार्शनिक नींव दिखाती है। समाज को आदर्श बनाने का तरीका भी यह किताब बताती है। आपकी सोच समस्या को सुलझाने पर यह किताब लेकर जाती है।