छोटे शहर में गौर करें, तो अचानक से महिलाओं ने घर बैठे साड़ियों का बिजनेस शुरू कर दिया है। आइए जानते हैं इस व्यवसाय में लोगों का रुझान क्यों बढ़ा।
सूरत है बहुत बड़ा हब

दरअसल, सूरत से ढेर सारी साड़ियां मंगाई जा रही हैं और छोटे शहरों में होलसेल में यहां से साड़ियां लेना काफी सस्ता पड़ता है और इसलिए भी वह इसे मंगा लेती हैं, इसके लिए उन्हें बहुत अधिक मेहनत की जरूरत नहीं होती है। साथ ही किसी डिग्री की भी जरूरत नहीं पड़ती है और अपने मनचाहे समय पर काम करने का मौका मिल जाता है, इसलिए साड़ियों के बिजनेस ने कमाल किया हुआ है। दरअसल, सूरत जैसे शहरों में हजारों साड़ी मैन्युफैक्चरर्स और होलसेलर्स मौजूद हैं, जो सीधे छोटे शहरों के दुकानदारों को माल सप्लाई करते हैं। सोशल मीडिया और व्हाट्सएप्प के जरिए आज छोटे शहरों के व्यापारी सीधे बड़े कारखानों से जुड़कर लेटेस्ट डिजाइन मंगवा लेते हैं।
साड़ी की सांस्कृतिक पहचान
भारत में साड़ी केवल एक कपड़ा नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान है। विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों में, साड़ी की खपत कुल बाजार का लगभग 60 प्रतिशत है। ऐसे में शादी-ब्याह, त्यौहार और रोजमर्रा के पहनावे के लिए साड़ियों की मांग साल भर बनी रहती है। इसलिए ऐसी कई महिलाएं हैं, जो चंद घंटों के लिए काम करके भी अच्छा मुनाफा कमा ले रही हैं। इसलिए भी इस बिजनेस मॉडल ने कमाल कर दिया है।
निवेश छोटी आसान शुरुआत

आपको यह जानकर भी हैरानी होगी कि साड़ी के व्यवसाय ने बहुत शानदार पहचान इसलिए भी किया है छोटे शहरों में, क्योंकि इसमें बहुत अधिक निवेश करने की जरूरत पड़ती नहीं है और बेहद कम निवेश और आसान शुरुआत करके काफी अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। जैसे कि अगर साड़ी के व्यापार को शुरू करने की बात करें, इसे घर से भी शुरू किया जा सकता है। इसमें किसी बड़ी फैक्ट्री या बहुत ज्यादा शुरुआती पूंजी की जरूरत नहीं होती, जिससे यह छोटे उद्यमियों और महिलाओं के लिए एक आकर्षक विकल्प बन जाता है। वहीं इसमें मुनाफे की अच्छी संभावना रहती है और इस बिजनेस में मार्जिन काफी अच्छा रहता है। जैसे कि बेसिक कॉटन साड़ियों पर जहां 10 प्रतिशत तक मुनाफा होता है, वहीं डिजाइनर और प्रीमियम साड़ियों पर यह 50 प्रतिशत से 100 प्रतिशत या उससे भी अधिक हो सकता है।
सोशल मीडिया भी है बहुत बड़ी वजह
सोशल मीडिया एक बड़ी वजह है कि बहुत अधिक इसका इस्तेमाल हो रहा है, न सिर्फ डिजाइनर बल्कि आम महिलाएं भी अपनी साड़ियां प्रदर्शित कर पा रही हैं और खूब अच्छी कमाई कर पा रही हैं। इसलिए सोशल मीडिया के सही इस्तेमाल के रूप में छोटे शहरों की महिलाओं के लिए यह बेस्ट साबित हुआ है। इसके साथ ही एक बड़ी वजह यह भी है कि बढ़ती आय और फैशन भी इसकी बड़ी वजह है। अब छोटे शहरों में लोगों की खर्च करने की क्षमता बढ़ी है। महिलाएं अब साधारण कपड़ों के बजाय डिज़ाइनर और फैंसी साड़ियों पर ज्यादा खर्च कर रही हैं, जिससे मार्केट में वैरायटी की मांग बढ़ी है। गौर करें, तो इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स ने छोटे शहर के व्यापारियों के लिए अपने उत्पाद बेचना आसान बना दिया है। वे घर बैठे ही अपने शहर और आसपास के इलाकों में मार्केटिंग कर लेती हैं। एक तरीका यह भी है कि ऐसी भी कई महिलाएं हैं, जिन्हें अधिक मेहनत नहीं करनी है और बिना स्टॉक खरीदे यह काम करना है, तो वह बिना स्टॉक खरीदे भी यह काम कर रही हैं, इसके लिए वह करती यह है कि वे बड़े सप्लायर्स के व्हाट्सएप्प ग्रुप से जुड़ जाती हैं और उनकी फोटो अपने ग्राहकों को भेजती हैं और ऑर्डर मिलने पर ही माल मंगवा लेती हैं। इससे रिस्क लगभग खत्म हो जाता है। एक बड़ी वजह यह भी है कि अब छोटे शहरों के व्यापारियों को अखबार में विज्ञापन देने की जरूरत नहीं पड़ती। सोशल मीडिया पर रील और फोटो डालकर वे सीधे ग्राहकों तक पहुंच रही हैं। आंकड़ों के अनुसार, डिजिटल मार्केटिंग अपनाने वाले बिजनेस 78 प्रतिशत अधिक रेवेन्यू जेनरेट कर रही हैं। इन्फ्लुएंसर भी निभाते हैं अहम भूमिका, क्योंकि वे तरह-तरह के इवेंट्स में कई जगहों में आपकी साड़ियों को प्रोमोट करते हैं। इसलिए इसे करते रहना चाहते हैं लोग और करना ही चाहिए। इसके फायदे काफी हैं, जिसे भूला नहीं जा सकता है और इन्हें करते रहने के विकल्प अच्छे हैं, ताकि साड़ी बिजेनस को बढ़ावा मिले।
बजट और विकल्प

बजट और विकल्प की बात करें, तो हर बजट के लिए विकल्प मौजूद होती है। छोटे शहरों में दुकानदार 300 रुपये से लेकर 1000 रुपये तक की साड़ियों पर 10 प्रतिशत से 20 प्रतिशत और प्रीमियम साड़ियों पर 30 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक का मार्जिन आसानी से कमा लेती हैं और साथ ही भारत में साल के 12 महीनों में से लगभग 8 महीने शादी और त्यौहारों के होते हैं। इस दौरान मांग इतनी ज्यादा होती है कि एक छोटा सा होम-बेस्ड बिजनेस भी अच्छा मुनाफा निकाल लेता है।
जानें यह भी
इस बात को समझना जरूरी है और जानना भी जरूरी है कि दक्षिण भारत अपने कांचीपुरम और मैसूर सिल्क साड़ियों के लिए मशहूर है, जिनका भारत के साड़ी बाज़ार में लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा है। साथ ही यह भी समझना जरूरी है कि पश्चिमी भारत में, गुजरात और महाराष्ट्र के पास बाजार का 19 प्रतिशत हिस्सा है, जो बंधनी, पैठणी और अन्य साड़ियां बनाते हैं। साथ ही साथ पश्चिम बंगाल और ओडिशा पूर्वी भारत में बाजार में सबसे आगे हैं, जिनका 19 प्रतिशत हिस्सा है और वे जामदानी और संबलपुरी साड़ियों का खास उत्पादन करते हैं। साथ ही साथ यह भी समझ लीजिए कि बनारसी और चिकनकारी साड़ियों का उद्योग पर दबदबा है, जिसमें पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश का उत्तरी भारत में 14 प्रतिशत बाजार का हिस्सा है।