फैशन ट्रेंड में ऐसी कई चीजें हैं, जिन्हें आप अपनाकर सस्टेनेबल जिंदगी जी सकती हैं। कुछ बेहद रोचक फैशन ट्रेंड के बारे में हम आपको बताते हैं।
मशरूम फैशन की अहमियत

आप यह सुन कर हैरान हो सकते हैं, लेकिन सस्टेनेबल फैशन में मशरूम का उपयोग सिर्फ एक ट्रेंड नहीं, बल्कि एक "बायो-फैब्रिकेशन रिवोल्यूशन" बन चुका है और लोग इसे काफी एन्जॉय कर रहे हैं और पहनना पसंद भी कर रहे हैं। यह एक तरह से ऐसा ट्रेंड बन रहा है, जिसमें पारंपरिक चमड़े और सिंथेटिक कपड़ों को रिप्लेस करने की कोशिश है। सबसे बड़ा ट्रेंड मशरूम लेदर (जैसा मायलो और ऋषि) है, जो फंगस की जड़ संरचना यानी मायसेलियम से बनता है। यह पूर्ण रूप से इको-फ्रेंडली है, जो पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल है और 45-90 दिनों में मिट्टी में मिल जाता है। इसका उपयोग इसलिए भी पसंद किया जा रहा है, क्योंकि यह कम संसाधन का उपयोग करके बन जाता है और इसे बनाने में जानवरों के चमड़े का मुकाबला 99 प्रतिशत कम पानी लगता है और ये सिर्फ 2 हफ्ते में बढ़ जाता है। इसके गुणों की बात करें, तो यह सामग्री फायर रेसिस्टेंट, वॉटर प्रूफ और एंटी-माइक्रोबियल होती है, जो इस संवेदनशील त्वचा के लिए भी सुरक्षित है। इस बारे में आपको जानकारी जरूर मिलनी चाहिए कि माइसेलियम को विकसित करके एक नया फैब्रिक बनाया गया है, जो सिल्क की तरह मुलायम और हल्का होता है, लेकिन पूरी तरह वीगन है।
लोकल को बढ़ावा
अगर छोटे शहरों की बात करें, तो हथकरघा का पुनरुद्धार (लोकल को बढ़ावा) हो रहा है और छोटे शहरों में कई तरह के तरीके अपनाये जा रहे हैं, ऐसे में बुनाई केंद्रों के पास बसे छोटे शहर जैसे चंदेरी, महेश्वर या संबलपुर स्थानीय वस्त्रों की ओर लगातार लौट रहे हैं। इन बातों का मतलब यह है कि अब बड़े शहरों के मॉल के बजाय सीधे स्थानीय बुनकरों से खरीदना लोग पसंद कर रहे हैं और साथ ही यह ट्रेंड शुद्ध सूती, खादी और लिनन पहनना, जो भारतीय जलवायु के अनुकूल हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहारा देते हैं। इसलिए भी काफी ट्रेंड में हैपारंपरिक अपसाइक्लिंग ‘पोटली और पैचवर्क संस्कृति

छोटे शहर हमेशा से जीरो वेस्ट एकत्रित करने में माहिर रहे हैं, भले ही वे इसे इस नाम से न पुकारते हों। बता दें कि कंथा और पैचवर्क हमेशा से सस्टेनेबल फैशन को सपोर्ट करते हैं और पुरानी साड़ियों या कपड़े के टुकड़ों का उपयोग करके नई जैकेट, बैग या रजाई बनाने का काम हमेशा से लोकप्रिय है। अगर हम कस्टम टेलरिंग की बात करें, तो लोग ‘फास्ट फैशन’ खरीदने के बजाय, कपड़ा खरीदना और स्थानीय दर्जी के पास जाना पसंद करते हैं आज भी। इससे भी काफी सस्टेनेबिलिटी बढ़ती हैं और इससे बड़े पैमाने पर उत्पादन से होने वाला कचरा कम होता है और उच्च गुणवत्ता वाली सिलाई के कारण कपड़े की टिकाऊपन सुनिश्चित होती है।
कारीगरों से सीधा माल खरीदना
छोटे शहरों में लगातार ये काम हो रहा है कि आपको कारीगरों से सीधा माल खरीदने में मदद मिल रही है और साथ ही ऐसे कई गांव के आर्टिस्ट या कलाकार हैं, जिनके काम को बढ़ावा मिल रहा है। पारदर्शिता और उचित मजदूरी सुनिश्चित करने के लिए उपभोक्ता तेजी से बुनकरों से सीधे माल खरीद रहे हैं। महानगरों के उपभोक्ताओं के विपरीत, जो अंतरराष्ट्रीय रुझानों का पीछा कर सकते हैं, छोटे शहरों के फैशन के शौकीन लोग कपड़ों को कई अवसरों के लिए लेयरिंग और पुन: उपयोग करने में माहिर होते हैं, एक ऐसी प्रथा जो अब "एंटी-फास्ट फैशन" के रूप में चलन में है और जिन्हें छोटे शहरों में बहुत तेजी से अपनाया जा रहा है।
थ्रिफ्ट या हाइपरलोकल लव
थ्रिफ्ट और हाइपरलोकल लव भी काफी पसंद किया जा रहा है और ऑनलाइन रीसेल लगातार लोग अपना रहे हैं, साथ ही छोटे शहरों में समुदाय के अंदर कपड़ों के पुन: उपयोग और मरम्मत की एक मजबूत संस्कृति बनी हुई है, जो एक प्राकृतिक चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देती है।
चीजों का उपयोग

आज भी महिलाएं वहां यानी छोटे शहरों में, महिलाएं पांच से सात पुरानी साड़ियों या धोतियों को एक के ऊपर एक रखकर साधारण सिलाई से जोड़कर रजाई, चादर या हल्के कंबल बनाती हैं, जो कि काफी फैशनेबल डेकोर का हिस्सा पूरे भारत में बनते हैं। साथ ही महाराष्ट्र में कांथा की तरह ही, ये पुरानी साड़ियों पर पैचवर्क करके हाथ से सिली हुई रजाई होती हैं। सजावटी बॉर्डर को अक्सर दोबारा इस्तेमाल करके आकर्षक किनारे बनाए जाते हैं। और तो और चिंदी गलीचे की बात करें, तो गुजरात और महाराष्ट्र में बचे हुए कपड़े के टुकड़ों को एक से दो इंच की पट्टियों में काटकर, उन्हें आपस में गूंथकर या बुनकर टिकाऊ, बहु-बनावट वाले डोरमैट और फर्श के कालीन बनाए जाते हैं। साथ ही रल्ली रजाई के रूप में पंजाब में चमकीले रंगों के कपड़े के छोटे-छोटे टुकड़ों को जियोमेट्रिकल डिजाइनों में एक साथ सिला जाता है, जिनमें अक्सर पारंपरिक रूपांकन शामिल होते हैं।
कम्युनिटी सर्कुलैरिटी
गौर करें, तो छोटे शहरों में एक सदी से भी अधिक समय से, इस घुमंतू समुदाय के सदस्य मोहल्लों में पुराने कपड़ों के बदले नए स्टील या प्लास्टिक के बर्तनों का आदान-प्रदान करते आ रहे हैं। फिर वे इन कपड़ों को धोते, मरम्मत करते और इस्त्री करते हैं और अनौपचारिक "चिंदी बाज़ारों" में किफायती दरों पर बेचते हैं।साथ ही यह भी अपनाते हैं कि बड़े भाई-बहनों से छोटे भाई-बहनों को कपड़े देना एक सामान्य प्रथा है। कई संस्कृतियों में, शिशुओं को जानबूझकर पुराने कपड़े पहनाए जाते हैं, क्योंकि बार-बार धोने से कपड़ा नरम और उनकी त्वचा के लिए कोमल हो जाता है। ऐसे में मान लें कि छोटे शहरों में रेशमी साड़ियों और कुर्ते जैसे भव्य परिधानों को संरक्षित किया जाता है और पीढ़ियों तक अनमोल पारिवारिक विरासत के रूप में आगे बढ़ाया जाता है।