इन दिनों ऐसे कई ब्रांड हैं और कई लोग हैं, जो कतरन में फैशन ढूंढ रहे हैं और लोग उन्हें पसंद कर रहे हैं। आइए जानें इसके बारे में विस्तार से।
क्या होता है कतरन

कतरन, उन कटे-बचे और वेस्ट की तरह, बेकार पड़े कपड़े होते हैं, जो कई कंपनियों के इस्तेमाल के बाद, या किसी दाग-धब्बे के लगने के बाद हटा दिए जाते हैं, लेकिन सस्टेनेब्लिटी को ध्यान में रखते हुए अब ऐसे कई फैशन डिजाइनर हैं, जो इनका इस्तेमाल करके कुछ नया क्रिएट करने की कोशिश कर रहे हैं और खास ब्बात यह है कि उन्हें काफी पसंद किया जा रहा है और छोटे शहरों में इनका नाम काफी हो रहा है, इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि टिकाऊपन, किफायती दाम और अनोखे कारीगरी वाले डिजाइन का संगम बन कर उभर रहा है। यह कतरन फैब्रिक वाले फैशन की खूबी यह है कि अब इसकी वजह से काफी बदलाव आ गए हैं और स्थिरता का इसे उदय माना जा रहा है। अगर हम डिजाइनर और उपभोक्ता की बात करें, तो इन बचे हुए टुकड़ों को उनके अनूठे सौंदर्य और पर्यावरणीय लाभों के लिए तेजी से महत्व दिया जा रहा है।
कतरन का चलन क्यों बढ़ रहा है
अगर हम इस बात पर जोर दें कि आखिर क्या वजह है कि कतरन का फैशन लगातार बढ़ रहा है, तो इसके बारे में यही कहा जायेगा कि यह अपशिष्ट-मुक्त और सतत विकास फैशन उद्योग प्रदूषण का एक बड़ा स्रोत है, और कतरन का उपयोग लाखों टन कपड़ा कचरे को लैंडफिल में जाने से रोकने में मदद करता है। और आजकल ऐसे कई ब्रांड हैं, अपशिष्ट-मुक्त रणनीति अपना रहे हैं, और कभी कुछ भी नहीं समझी जाने वाली चीज को कई परिधान में तब्दील किया जा रहा है। अगर अद्वितीय डिजाइन की बात करें, तो कतरन में अनियमित आकार, बनावट और डिजाइन होते हैं, इसलिए इससे बना हर उत्पाद अपने आप में अनूठा होता है। यह आधुनिक उपभोक्ताओं को आकर्षित करता है, जो विशेष रूप से निर्मित या एकमात्र स्टेटमेंट पीस की तलाश में हैं। वहीं उच्च श्रेणी के भारतीय डिजाइनर्स आजकल कतरन का उपयोग जटिल बनावट, परिधान मूर्तिकला और होम कलेक्शन बनाने के लिए कर रहे हैं, और ‘स्क्रैप’ को एक कला रूप दे रहे हैं। वहीं कतरन पर केंद्रित कई लेबल सामाजिक उद्यमों के रूप में काम करते हैं, जो हाशिए पर रहने वाले समुदायों की महिलाओं को इन स्क्रैप को अपसाइकिल करके हस्तनिर्मित एक्सेसरीज बनाने के लिए प्रशिक्षित और रोजगार प्रदान करते हैं।
छोटे शहरों में बढ़ा है चलन

अगर हम बात 2026 की करें, तो छोटे शहर में इसका तेजी से उपयोग हो रहा है, यह वहां की कई महिलाओं को रोजगार से भी जोड़ रहा है और लक्जरी फैशन से आगे बढ़कर भारत के छोटे शहरों में, जिनमें टियर 2 और टियर 3 तक पहुंच गया है, जिसका मुख्य कारण सर्कुलर फैशन और स्थानीय उद्यमिता की ओर बढ़ता रुझान है। अगर कीमत के प्रति संवेदनशील बाजार की बात करें, तो कतरन ब्रांडेड लुक बनाने का एक किफायती तरीका प्रदान करता है। कचरे को अपसाइकिल करके कपड़े बनाने से, स्थानीय डिजाइनर अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों की तुलना में कम कीमतों पर अद्वितीय, उच्च गुणवत्ता वाले परिधान उपलब्ध करा सकते हैं। एक बड़ी वजह यह भी है कि छोटे शहरों में कई महिलाओं ने अपने कपड़ों का ब्रांड शुरू कर दिया है और जयपुर, लखनऊ और इंदौर जैसे छोटे शहर नए फैशन हब के रूप में उभर रहे हैं। ऐसे में स्थानीय उद्यमी कतरन का उपयोग करके ‘जीरो-वेस्ट’ ब्रांड बना रहे हैं, जो सांस्कृतिक प्रामाणिकता और स्थिरता को महत्व देने वाले जागरूक उपभोक्ताओं के बढ़ते वर्ग के साथ तालमेल बिठा रहे हैं।
सामाजिक प्रभाव और कौशल विकास
सिर्फ यह कमाई का ही जरिया नहीं है, बल्कि कतरन की कई पहलें इन छोटे शहरों में हाशिए पर रहने वाले समुदायों की महिलाओं को प्रशिक्षण और रोजगार प्रदान करने पर केंद्रित हैं। यह स्थानीय शिल्प को एक स्थायी आजीविका में बदल देता है, जिससे कारीगरों को आवाज और आर्थिक स्वतंत्रता मिलती है। साथ ही गौर करें, तो यह सांस्कृतिक विरासत और मॉडर्न ब्यूटीफिकेशन को भी बेहतर करने का काम कर रहा है, अगर छोटे शहरों के निवासी की बात करें, तो वहां की महिलाओं ने अक्सर पारंपरिक मूल्यों और आधुनिक आकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाये रखने की कोशिश की है और कतरन एक ‘फ्यूजन’ शैली को बढ़ावा देने में कामयाब हुआ है, जो सांस्कृतिक रूप से जुड़ाव और आधुनिकता दोनों का एहसास कराता है।
अति-स्थानीय आपूर्ति शृंखलाएं

बड़े पैमाने पर विनिर्माण के विपरीत, कतरन का उत्पादन अक्सर स्थानीय दर्जियों और कारीगरों द्वारा किया जाता है, जिससे कार्बन उत्सर्जन कम रहता है और व्यावसायिक मॉडल फ्लेक्सिबल बना रहता है। यह ‘ग्लोकल’ आकर्षण उन आधुनिक उपभोक्ताओं को आकर्षित करता है, जो अद्वितीय, हस्तनिर्मित वस्तुओं की तलाश में रहते हैं।
क्या-क्या बन रहे हैं कतरन से
हेयर ऐसेसरीज से लेकर बैग्स, ड्रेस, साड़ियां, ज्वेलरी, फुटवेयर्स और ऐसी कई चीजें लगातार बन रही हैं ऐसेसरीज से।