अगर हम भारतीय प्रधान की बात करते हैं, तो हमारे जेहन में सिर्फ साड़ी और सलवार सूट की बात होती है, लेकिन ऐसा नहीं है। तो आइए जानते हैं कुछ खास भारतीय परिधानों के बारे में।
कालबेलिया परिधान, राजस्थान

अगर राजस्थान की बात करें, तो कालबेलिया परिधान भी भारतीय परिधान के रूप में खासतौर से जाना जाता है। बता दें कि राजस्थान के कालबेलिया समुदाय (सपेरा जाति) की पारंपरिक और आकर्षक वेशभूषा है, जो बेहद पसंद की जाती रही है और मुख्य रूप से उनके प्रसिद्ध लोक नृत्य के दौरान पहनी जाती है। यह पोशाक काले और लाल रंग के मेल तथा सांप की त्वचा जैसी दिखने वाली डिजाइन से पहचानी जाती है। यह एक खास परिधान है, जिसकी खूबी यह है कि यह राजस्थान में खास मौके पर पहनी जाती है। पोशाक की बात करें, तो मुख्य आधार गहरा काला या गहरा लाल होता है। इस पर चमकीले लाल, पीले, हरे और सफेद रंगों के धागों व गोटा-पत्ती से सुंदर कढ़ाई की जाती है। इस परिधान में मुख्य रूप से तीन हिस्से होते हैं, जैसे अंगरखी/चोली और इसके बारे में आपको बता दें कि इसका ऊपरी हिस्सा जो शरीर पर कसा हुआ और सुंदर कढ़ाई वाला होता है। वही घाघरा ऐसा है, जो नीचे का बहुत अधिक घेर (फ्लेयर) वाला लंबा स्कर्ट, जो घूमते समय सांप की गति जैसा प्रभाव देता है। अगर बात ओढ़नी और दुपट्टे की की जाये, तो सिर और कंधे को ढकने के लिए रंग-बिरंगे बॉर्डर वाला बारीक कपड़ा होता है। इसके बारे में खास बात यह जान लें कि इस परिधान के साथ महिलाएं भारी चांदी के पारंपरिक आभूषण पहनती हैं। और गले में मोतियों के हार, माथे पर बोरिया (टीका), और कोहनी व बाजू तक भारी चूड़ियां व बाजूबंद पहने जाते हैं। वहीं नर्तकियों के बाल गुंथे हुए और फूलों या पारंपरिक बंधेज से सजे होते हैं और बेहद पसंद किये जाते हैं।
बैगा, मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश की बैगा जनजाति का पहनावा बेहद सरल और प्रकृति के अनुकूल होता है और यह भारतीय परिधानों में से खास है। बैगा महिलाओं की बात करें, तो महिलाएं एक ही लंबे सूती कपड़े को शरीर पर लपेटती हैं, जिसे 'कपड़ा' कहा जाता है। गौरतलब है कि यह आमतौर पर घुटनों तक ही लंबा होता है, ताकि उन्हें जंगलों में चलने और काम करने में आसानी हो। वे पारंपरिक रूप से ब्लाउज नहीं पहनती हैं। हालांकि आधुनिक समय में बदलाव आ रहा है। बैगा जनजाति का पहनावा उनकी सरल जीवनशैली, जंगलों में रहने की परिस्थितियों और प्रकृति के प्रति उनके गहरे जुड़ाव को दर्शाता है। वे केवल उतने ही वस्त्र पहनते हैं, जितने दैनिक जीवन और शारीरिक श्रम, जैसे जंगलों से लकड़ी या जड़ी-बूटी इकट्ठा करना के लिए व्यावहारिक हों।
गोंचा परिधान, लेह-लद्दाख

गोंचा परिधान की बात करें, तो लेह-लद्दाख में गोंचा परिधान बेहद शौक से पहने जाते हैं और पसंद किये जाते हैं। गोंचा परिधान की खासियत यह भी है कि इसमें ट्रेडिशनल रंग दिखते है। गोंचा लद्दाख की एक पारंपरिक और प्रसिद्ध ऊनी पोशाक है, जिसे पुरुष और महिलाएं दोनों पहनते हैं। यह ठंडे मौसम से बचने के लिए हाथ से बुने हुए मोटे ऊनी कपड़े (नंबू) से बनाई जाती है। यह लंबे कोट की तरह ढीली-ढाली और पूरे शरीर को ढकने वाली पोशाक होती है। अगर कमरबंद की बात करें, तो इसे कमर पर कसकर बांधने के लिए 'स्केरेख' (Skerekh) नामक एक कपड़े के पटके का उपयोग किया जाता है। इसे शुद्ध ऊन, पश्मीना या स्थानीय ऊनी करघे के वस्त्रों से तैयार किया जाता है। भारत में "गोंचा" शब्द के दो बिल्कुल अलग और बहुत मशहूर सांस्कृतिक अर्थ हैं, लद्दाख का पारंपरिक लिबास और बस्तर का जीवंत आदिवासी त्योहार। शादियों और मठों के बड़े त्योहारों के दौरान, स्थानीय लोग बहुत शानदार और चमकीले रंगों वाले 'गोंचा' पहनते हैं। ये प्रीमियम ब्रोकेड, सिल्क या वेलवेट से बने होते हैं और अक्सर भूटान और नेपाल से मंगाए जाते हैं। इनमें से कुछ खास तरह के गोंचा में पश्मीना ऊन के साथ कश्मीरी 'आरी' कढ़ाई का काम भी किया जाता है।
कंजारी, गुजरात
कंजारी गुजरात के कच्छ और थार-राजस्थान क्षेत्र की विभिन्न समुदायों, जैसे सोधा, मेघवाल, रबारी आदि की महिलाओं द्वारा पहना जाने वाला एक पारंपरिक ऊपरी परिधान या चोली (ब्लाउज) है। यह विशेष रूप से विवाह के बाद महिलाओं की पहचान और पारंपरिक पोशाक का अहम हिस्सा रहा है। यह आमतौर पर आगे की तरफ से थोड़ा लंबा होता है। साथ ही कढ़ाई और शीशा वर्क की बात करें, तो इस पर पारंपरिक हस्तशिल्प जैसे पक्को/बाट भारत कढ़ाई और चमकीले छोटे शीशों (आभला) का बारीक काम किया जाता है। इसे रेगिस्तानी जीवन और शारीरिक श्रम को ध्यान में रखकर इस तरह बनाया जाता है कि यह शरीर के आकार के अनुकूल ढल जाए। इसलिए यहां काफी पसंद से पहना जाता है।
कुमाऊनी घाघरा चोली, उत्तराखंड

कुमाऊनी घाघरा चोली (कुमाऊनी परिधान) उत्तराखंड के कुमाऊ क्षेत्र की महिलाओं का एक अत्यंत सुंदर और पारंपरिक पहनावा है। यह पोशाक यहां की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक कला और सुहाग का प्रतीक मानी जाती है। शादी-ब्याह, त्योहारों (जैसे हरेला, घुघुतिया) और मांगलिक अवसरों पर महिलाएं इसे बड़े चाव से पहनती हैं। यह एक घेरदार और लंबा लहंगा होता है, जिसे स्थानीय स्तर पर घाघरा कहा जाता है। पारंपरिक रूप से यह लाल, मखमली हरे, मैरून या चटकीले रंगों के कपड़ों से बनाया जाता है, जिस पर गोटा-पट्टी या स्थानीय कढ़ाई का खूबसूरत काम होता है। (ब्लाउज)घाघरे के साथ पहने जाने वाले ब्लाउज को स्थानीय भाषा में अंगड़ी या चोली कहा जाता है। यह अक्सर कंट्रास्ट रंगों (जैसे हरे घाघरे के साथ लाल चोली या लाल घाघरे के साथ पीली/हरी चोली) में तैयार की जाती है और इस पर भी पारंपरिक डिजाइन बने होते हैं। कुमाऊनी घाघरा चोली का सबसे खास और अनिवार्य हिस्सा इसकी ओढ़नी या दुपट्टा है, जिसे 'रंगवाली पिछौड़ा' (या पिछोड़ी) कहा जाता है। यह केवल पीले और लाल (या मैरून) रंग के संयोजन से बनता है। पीला रंग मातृत्व और समृद्धि का तथा लाल रंग ऊर्जा व सुहाग का प्रतीक है। इसके केंद्र में शंख, चक्र, स्वास्तिक और सूर्य-चंद्रमा जैसे मांगलिक चिह्नों से युक्त एक 'स्वास्तिक' बनाया जाता है, जिसके चारों ओर डोटेड (बिंदुओं वाले) डिजाइन होते हैं। विवाहित महिलाओं के लिए इसे पहनना अनिवार्य माना जाता है।
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