छोटे शहरों में महिलाओं ने घरों के अंदर रहते हुए भी पूरी दुनिया घूमना सीख लिया है और अपने लिए एक दुनिया बनाना भी। जी हां, छोटे शहर में इन दिनों महिलाएं बन रही हैं इन्फ्लुएंसर और उन्होंने इसे अब करियर का रूप भी दे दिया है। आइए जानते हैं विस्तार से।
जिंदगी ज्यों का त्यों

छोटे शहर में महिलाओं की जिंदगी को सोशल मीडिया पर फ़ॉलोअर्स भी इसलिए मिल रहे हैं, क्योंकि उनकी जिंदगी आम होती है और महिलाएं उसे बिना किसी लाग-लपेट के लोगों को दर्शा भी रही हैं और लोग खुद को उससे जुड़ा पाते हैं। जुड़ाव महसूस करते हैं। इसलिए उन्हें देखना भी पसंद करते हैं। गौरतलब है कि उनका फोकस बहुत ज्यादा एडिट किए गए ग्लैमर के बजाय अपनी आम, रोजमर्रा की जिंदगी को दिखाकर बड़ी संख्या में लोगों को अपनी ओर खींच रही हैं। यह बदलाव, बहुत ज्यादा डेकोरेटिव और अमीर शहरी स्टाइल छोड़कर असल और सच्ची कहानियां बताने की तरफ एक बड़ा कदम है। गौरतलब यह भी है कि उनका फोकस महंगे फोन पर भी नहीं है, बल्कि सस्ते स्मार्टफोन से भी वह क्वालिटी वाली और कॉन्टेंट वाले वीडियो बना रहे हैं और टियर-2, टियर-3 और ग्रामीण इलाकों में डिजिटल सुविधाओं के तेजी से विस्तार की वजह से ये क्रिएटर्स 'क्रिएटर इकॉनमी' को नया रूप दे रही हैं।
स्थानीय बोलचाल और जीवनशैली
आम लोगों का घरेलू और सामान्य जीवन भी बड़े शहरों की महिलाओं और लोगों को प्रेरित कर रहे हैं। यूजर्स बनावटी और बहुत ज्यादा फिल्टर की गई लाइफस्टाइल से थक चुके हैं। और वे अब असली और बिना फिल्टर वाले जुड़ाव की तलाश में हैं। गौरतलब है कि कई वायरल क्लिप्स में बिना एडिट किए गए पॉज, आस-पास की असली आवाजें और बातचीत में इस्तेमाल होने वाली स्थानीय बोलियां देखने को मिलती हैं। आपको बता दें कि 40 प्रतिशत अधिक क्रिएटर्स का कहना है कि वे सोशल मीडिया का इस्तेमाल स्थानीय परंपराओं, क्षेत्रीय फैशन और लोक-कथाओं को दुनिया भर के दर्शकों तक पहुंचाने के लिए कर रहे हैं। साथ ही यह भी समझना होगा कि Instagram और YouTube जैसे प्लेटफॉर्म पर मुंबई और दिल्ली जैसे बड़े शहरों के दर्शकों की भारी संख्या देश के भीतरी इलाकों के क्रिएटर्स को देखने के लिए जुड़ रही है।
आत्मनिर्भरता और अपनी पहचान

यह भी एक खास माहौल बना है कि महिलाएं इस माध्यम से पूरी दुनिया से संवाद करने की कोशिश कर रही हैं और उन्हें आत्मनिर्भरता का भी एहसास हो रहा है, क्योंकि लोग उनके कॉन्टेंट को देख कर उन्हें काम देने की कोशिश कर रहे हैं और उनके साथ कई ब्रांड कोलेब्रेट करने की कोशिश कर रहे हैं। गौरतलब है कि इसका आर्थिक और सामाजिक असर और आर्थिक आजादी पर पूरी तरह असर दिख रहा है। जो महिलाएं पहले घर के काम संभालती थीं, वे अब मुख्य कमाने वाली बन रही हैं, खुद पर निवेश कर रही हैं और अकेले यात्राएं कर रही हैं।
ब्रांड बन रही हैं
आपको यह जानना बेहद जरूरी है कि अब महिलाएं खुद को ब्रांड बना रही हैं। अब बड़े-बड़े कंज्यूमर ब्रांड किसी सेलेब्रिटी चेहरे को नहीं, बल्कि ऐसी ही आम महिलाओं को शामिल करने लगी हैं। अब बड़े शहरों के बड़े इन्फ्लुएंसर, मैक्रो-इन्फ्लुएंसर की बजाय छोटे शहरों के छोटे इन्फ्लुएंसर माइक्रो-इन्फ्लुएंसर को चुन रहे हैं। आपको यह भी जानकर हैरानी होगी कि लोगों का स्थानीय स्तर पर भरोसा बढ़ा है और छोटे समुदायों में माइक्रो और नैनो-इन्फ्लुएंसर खर्च किए गए हर रुपये पर दोगुना ऑर्गेनिक रीच भी बढ़ी है और उनके दर्शक उनकी सीधी और लोगों से सुनी-सुनाई सिफारिशों पर भरोसा करते हैं। साथ ही गांव या छोटे शहर की एक आत्मविश्वासी महिला का अपना डिजिटल ब्रांड बनाना युवा लड़कियों के लिए नए रोल मॉडल पेश करता है, और परिवार बनाम महत्वाकांक्षा से जुड़ी पुरानी सोच को तोड़ता है।
क्या कहते हैं आंकड़े

कुछ आंकड़ों पर गौर करें, तो टियर-3 और टियर-4 मार्केट के क्रिएटर्स का एंगेजमेंट रेट 4.5 प्रतिशत से 5.5 प्रतिशत तक होता है। साथ ही मेट्रो शहरों के इन्फ्लुएंसर्स का औसत एंगेजमेंट रेट इससे काफी कम, यानी 3 प्रतिशत से 4 प्रतिशत होता है। वहीं नॉन-मेट्रो इलाकों का मार्केट साइज ₹3,375 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। गौर यह भी करें कि इंग्लिश कंटेंट की तुलना में लोकल भाषा (वर्नाक्युलर) वाले वीडियो कंटेंट से 2 से 3 गुना ज्यादा ऑडियंस एंगेजमेंट मिलता है। वहीं 43 प्रतिशत से 48 प्रतिशत से ज्यादा ब्रांड कैंपेन पारंपरिक बड़े शहरों के बाहर चलाए जाते हैं। साथ ही साथ इन्फ्लुएंसर पर होने वाले कुल खर्च में रीजनल कंटेंट के लिए बजट 20 प्रतिशत तक बढ़ गया है। यह भी जान लें कि क्रिएटर्स के साथ चलाए जाने वाले कैंपेन की लागत आमतौर पर मेट्रो शहरों के रेट्स के मुकाबले बहुत कम होती है, जिससे खर्च किए गए हर रुपये पर कहीं बेहतर कन्वर्जन रिजल्ट मिलते हैं।
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