सपर क्लब के ट्रेंड ने भारत में दस्तक कुछ सालों से दी है, बड़े शहरों के साथ-साथ छोटे शहरों में भी अब यह ट्रेंड तेजी से पहचान बना रहा है। न सिर्फ शौक के रूप में, बल्कि एक बिजनेस मॉडल के रूप में भी। कैसे, यह जानने के लिए हमने कुछ एक्सपर्ट्स से भी बातचीत की आइए जानें विस्तार से।
क्या है सपर क्लब ट्रेंड

सपर क्लब्स का ट्रेंड बढ़ रहा है, जो खाने के शौकीनों को अनोखा अनुभव और उद्यमियों को कम लागत में लाखों की कमाई का मौका दे रहा है। दरअसल, इस ट्रेंड का मतलब यह है कि यह खान-पान के शौकीन, जो ग्रुप में एन्जॉय करते हैं, उन्हें एक अंतरंग और यादगार सामाजिक भोजन अनुभव देना, जिसकी मेजबानी उत्साही शेफ या घरेलू रसोइये करते हैं। पारंपरिक रेस्तरां के विपरीत, सपर क्लब मेहमानों को सामुदायिक मेजों के आसपास एक साथ लाते हैं, जिससे बातचीत, जुड़ाव और भोजन का अनुभव करने का एक अनूठा तरीका मिलता है।
यह आकार कैसे लेता है
यह बात गौरतलब है कि जब आप किसी सपर क्लब में बुकिंग करते हैं, तो आमतौर पर आपको मेजबान द्वारा तैयार किया गया एक निश्चित चखने वाला मेन्यू मिलता है। यह बात ध्यान रखने योग्य है कि व्यंजनों के विकल्प सीमित होते हैं, लेकिन अधिकांश मेजबान खानपान संबंधी प्रतिबंधों का ध्यान रखने में मदद करते हैं। एक मेजबान अपने घर के सेटअप में रेस्टॉरेंट की फीलिंग महसूस कराते हैं और आपके खान-पान के अनुभव को महसूस करते हैं।
शौक बदला बिजनेस में : मनीषा प्रधान, हैप्पी क्लब, सपर क्लब अनुभवी

मनीषा पिछले कुछ सालों से सपर क्लब ट्रेंड के साथ कदमताल कर रही हैं। वह बताती हैं कि उनके लिए शुरू में यह एक बिजनेस आइडिया जैसा कुछ नहीं था। बकौल मनीषा यह एक ऐसी भावना के तौर पर शुरू हुआ था, जिसे मैं काफी सालों से करना चाहती थीं। बड़े होते हुए, मैंने अपनी मां को प्यार जताने का सबसे आसान, फिर भी सबसे असरदार तरीका अपनाते देखा था और उसके लिए वह खान-पान का जरिया चुनती थीं। हमारे घर में जो भी आता, वह उसे बिना प्यार से बना, घर का खाना खिलाए कभी जाने नहीं देती थीं और काफी शौक से खिलाती थी। 'द हैप्पी प्लेट' असल में उसी भावना का एक विस्तार है। मनीषा मानती हैं कि सपर क्लब इसलिए भी लोकप्रिय हुआ, क्योंकि लोगों को कहानियों के साथ बाहर जाकर खाना खाने में मजा आने लगा।
महिलाओं के लिए नया नजरिया
वह कहती कि महिलाओं के लिए यह काफी अच्छा है, क्योंकि अपनी खुद की रसोई से कुछ बनाना खास अनुभव देता है। अपने पेस पर महिलाएं इसे बिजनेस का रूप दे सकती हैं। वह मानती हैं कि महिलाओं के लिए यह सिर्फ एक बिजनेस मॉडल नहीं है, बल्कि यह एक तरह की आजादी है। बकौल मनीषा मुझे लगता है कि सपर क्लब का ट्रेंड और बढ़ेगा, क्योंकि हम कहीं भी रहें, हम सभी कुछ ऐसा ढूंढ रहे होते हैं, जो थोड़ा ज़्यादा असली, थोड़ा ज्यादा ह्यूमन टच के साथ मिले। वह कहती हैं कि अगर महिलाएं इसको लेकर बिजनेस का रूप देना चाहती हैं, तो उन्हें ऐसा करना ही चाहिए और आज में यकीन करें, क्योंकि एक खास दिन कभी नहीं आता है। छोटे से शुरू करें, भले ही आप कुछ ही लोगों के लिए खाना बना रही हों। किसी और के रास्ते पर चलने की कोशिश करने के बजाय, अपने खाने को अपनी कहानी कहने दें। और सबसे जरूरी बात, अपने साथ सब्र रखें। अगर कहीं इसके वर्कशॉप हों, तो उन्हें अटेंड करने की भी कोशिश करें।
नेपाली, तिब्बती, सिक्किमी और भूटानी क्यूजिन
बकौल मनीषा बताती हैं कि अपने सपर क्लब के लिए मैं नेपाली, तिब्बती, सिक्किमी और भूटानी खाना बनाती हूं। लेकिन नेवारी पकवान से मेरा लगाव बहुत है, क्योंकि नेवारी पकवान स्वाद और परंपरा के मामले में बहुत ही समृद्ध और कई परतों वाला होता है, फिर भी इसे इसके असली रूप में अभी भी ज्यादा लोग नहीं समझते हैं। उदाहरण के लिए, जिसे आज बहुत से लोग 'झोल मोमो' के नाम से जानते हैं, उसकी जड़ें असल में नेवारी पकवानों में ही हैं—परंपरागत रूप से इसे 'मोमोचा' के रूप में परोसा जाता था, जिसके साथ 'झोल' होता था; यह एक हल्का, स्वादिष्ट शोरबा होता है जो मोमो के स्वाद को और भी बढ़ा देता है। लेकिन मुंबई, दिल्ली या बैंगलोर जैसे शहरों में अक्सर 'झोल मोमो' के नाम पर जो परोसा जाता है, वह इसके असली स्वाद और संतुलन से काफी अलग होता है।
आत्म-विश्वास और सशक्त बना रहा है यह ट्रेंड : शेफ बिलकिस खान

बिलकिस खान खुद शेफ हैं और वह सपर क्लब के आयोजन को बेहद खास मानती हैं और एन्जॉय करती हैं। वह खुद बताती हैं कि मेरे लिए, यह 'सपर क्लब' महज एक विचार नहीं है, बल्कि यह मेरी जिंदगी की कहानी का एक हिस्सा है। बकौल बिलकिस मैं एक बंगाली सूफी पृष्ठभूमि से आती हूं, जहां भोजन केवल पेट भरने का जरिया नहीं है, बल्कि यह संस्कृति, यादों और अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का एक माध्यम भी है। बचपन से ही, मैं भोजन के सबसे खूबसूरत रूपों से घिरी रही हूं। मैं अपने परिवार की महिलाओं, जिनमें मेरी अपनी मां मौसियों और अपनी सास से सबकुछ सीखा, ये ऐसी महिलाएं थीं, जो कभी रेसिपी लिखकर नहीं रखती थीं, बल्कि अपने भीतर पीढ़ियों का ज्ञान समेटे हुए थीं। वे मेरी पहली गुरु थीं। उनसे मैंने सीखा कि खाना बनाना सिर्फ एक तकनीक नहीं है, बल्कि यह इरादे, देखभाल और प्यार से जुड़ा है। फिर जब लॉकडाउन के दौरान, मैंने एक छोटी-सी 'होम किचन' शुरू की, ताकि उन लोगों की मदद कर सकूं, जिन्हें खाने की जरूरत थी। फिर मैं हमेशा से एक शेफ बनना चाहती थी, लेकिन मैंने इसकी शुरुआत किसी बिजनेस प्लान के साथ नहीं की थी। मैंने लोगों को फोन करके बुलाने, छोटे-छोटे 'पॉप-अप' या सपर आयोजित करने और उन्हें खाना खिलाने से इसकी शुरुआत की। धीरे-धीरे, यह मेरी पहचान का एक हिस्सा बन गया।
सुकून देता है साथ खाना
बकौल बिलकिस मैं मानती हूं कि खाना हमें बेहतर बनाता है और यह लोगों को जोड़ता है और सुकून दे सकता है। मुझे लगता है कि खाना बनाने के लिए ही मेरा जन्म हुआ है। सपर क्लब के रूप में मैं एक ऐसी जगह बनाना चाहता था, जहां लोग सिर्फ खाना ही न खाएं, बल्कि उन्हें अपने घर जैसा महसूस हो। मेरा मानना है कि हमारा भविष्य हमारे अतीत से जुड़ा होता है, और अपने खाने के जरिए, मैं उसी अतीत को वापस लाने की कोशिश करती हूं, मैं चाहती हूं कि लोगों को खुशी और अपनापन महसूस हो, और उन्हें अपना वह बचपन याद आ जाए जिसे शायद वे भूल चुके हों।
प्रेजेंटेशन भी पसंद करते हैं लोग
बिलकिस का मानना है कि खाना अब ‘फास्ट’ ‘फ्यूजन’ पर आधारित और 'प्रेजेंटेशन' पर ज्यादा फोकस करने वाला हो गया है। लेकिन कहीं न कहीं, इसकी असलियत खोती जा रही है। और अब लोग वही असलियत वापस चाहते हैं। लोग उसी 'अपनेपन' की तलाश में हैं। वे ऐसा खाना चाहते हैं जो उन्हें घर की याद दिलाए, अपनी जड़ों की, और किसी ऐसी चीज की जिससे उनका कोई भावनात्मक जुड़ाव हो। एक 'सपर क्लब' ठीक इसी सोच को प्रस्तुत करता है। यह एक ऐसा माहौल भी बनाता है, जहां अलग-अलग संस्कृतियों के लोग एक साथ बैठते हैं, कहानियां साझा करते हैं और सीमाओं से परे भोजन का अनुभव करते हैं। पहले, त्योहारों के दौरान, और खासकर गांवों में, लोग साथ मिलकर भोजन करने के लिए इकट्ठा होते थे। आज, अपनी व्यस्त जिंदगी में हम उस संस्कृति को खो चुके हैं। सपर क्लब उसी भावना को एक आधुनिक अंदाज में वापस लाते हैं। छोटे शहरों में अब भी रोचक तरीकों से सपर क्लब किये जा रहे हैं।
महिला अपने सपने को पूरा कर पा रही हैं

बकौल बिलकिस मानती हैं कि इस ट्रेंड में कुछ हद तक महिलाओं के सपने को आकार दिया है। बकौल बिल्किश यह एक ऐसी बात है, जिस पर मुझे गहरा विश्वास है। हर महिला रेस्टोरेंट नहीं खोल सकती। इसके लिए निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर और सहयोग की जरूरत होती है। लेकिन एक 'सपर क्लब' आपको वह मौका देता है, बिना उन सभी रुकावटों के। आप इसकी शुरुआत अपनी खुद की रसोई से कर सकती हैं। और अपने स्टाइल में। जो कुछ आपके पास पहले से मौजूद है, उसी के साथ। बहुत सी महिलाओं में जबरदस्त हुनर होता है, लेकिन उनके पास कोई मंच नहीं होता। यह मॉडल उन्हें एक आवाज देता है। तो, यह सिर्फ कमाई के बारे में नहीं है। यह पहचान, आत्मविश्वास और मान-सम्मान के बारे में है। और जब आपके खाने की तारीफ होती है, जब लोग आपके काम से जुड़ते हैं, तो यह एक बहुत ही सशक्त होने का एहसास होता है। और यह उन महिलाओं के लिए आर्थिक आजादी का एक नया जरिया है, जो अपने घरों से बाहर कदम रख रही हैं।
हाइजीन और क्वालिटी का ख्याल
सपर क्लब को लेकर बिलकिस का यह भी मानना है कि लोग हाइजीन और क्वालिटी को मेंटेन करने वालों को ही पसंद करते हैं और फिर से इसे ऑर्गनाइज करने का मौका देता हैं। बकौल बिल्किश सच कहूं, तो, मेरे लिए क्वालिटी और हाइजीन का ख्याल रखना बेहद जरूरी हैं। मैं सबसे अच्छी चीजों पर ध्यान देती हूं और ज्यादातर ऑर्गेनिक, कोल्ड-प्रेस्ड तेल और फ्रेश चीजों पर और मैं चाहती हूं कि लोग मुझे इसी वजह से जानें। और एक बात जिसका मैं हमेशा पालन करती हूं कि खाना बनाने से पहले मैं प्रार्थना करती हूं, उन लोगों की सेहत और भलाई के लिए, जिन्हें मैं खाना खिला रही हूं, ताकि उन्हें पूरा पोषण मिले और उनका खाना आसानी से पच जाए। क्योंकि मेरा पक्का मानना है कि आपके अंदर जो ऊर्जा होती है, वह आपके खाने में झलकती है और धीरे-धीरे उन लोगों तक पहुंच जाती है, जो उसे खाते हैं। खाना सिर्फ वह नहीं है, जो आप पकाते हैं, बल्कि वह भी है, जो आप उसे पकाते समय महसूस करते हैं।
*Lead Photo & ALL Photos Credit : @manishapradhan@bilkis
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