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मुखवास : भारतीय संस्कृति के खान-पान की जान

टीम Her Circle |  March 18, 2026

भारत में हर खाने के बाद मुखवास खाने की एक परंपरा रही है। आइए जानें इस संस्कृति के बारे में विस्तार से। 

क्या है परम्परा 

भारत में खासतौर से माउथ फ्रेशनर के रूप में मुखवास खाया जाता रहा है।यह सदियों पुरानी एक सांस्कृतिक परंपरा है जो भोजन की समाप्ति का संकेत देती है और आतिथ्य सत्कार की भावना को दर्शाती है। संस्कृत के शब्द मुख (मुंह) और वास (सुगंध) से यह शब्द बना है और आपकी जानकारी के लिए बता दें कि  मुखवास बीजों और मसालों का एक रंगीन, सुगंधित मिश्रण है, जो पाचन में सहायता करता है और स्वाद कलियों को तरोताजा करता है।

परंपरा का मूल

अगर हम इसके परम्परा के मूल रूप को देखेंगे, तो इसका जुड़ाव आयुर्वेद से रहा है और मूल रूप से पाचन चिकित्सा के रूप में इसे विकसित किया गया है। इसमें मुख्य रूप से सौंफ, अजवाइन और तिल जैसी सामग्री का इस्तेमाल होता है और इसे माना जाता है कि यह पेट को शांत और शीतल रखता है। इसे आतिथ्य का प्रतीक भी भारत में माना जाता रहा है और भारत में मेहमानों को मुखवास परोसना भारतीय शिष्टाचार की एक खास पहचान है, जो उनके स्वास्थ्य और संतुष्टि के प्रति चिंता को दर्शाता है। हमारे यहां शादियों में तो इसका होना अनिवार्य ही माना गया है, इसके अलावा, किसी के घर खास भोजन के बाद दिवाली और होली जैसे त्योहारों और यहां तक ​​कि रेस्तरां के बिलिंग काउंटरों पर भी परोसा जाता है। खासतौर से अगर आपने मसालों और घी से भरपूर भोजन लिया है, तो मुखवास आपको बेहतर करने का काम करता है। 

शाही प्रभाव रहा खास 

मध्ययुग में, मुखवास एक साधारण स्वास्थ्य उपाय से प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया। जी हां, भारतीय शाही दरबारों ने इन मिश्रणों को मिक्चर की तरह मिलाया गया और मेहमानों को प्रभावित करने के लिए केसर, कपूर और चांदी की परत वाले पान के पत्तों को रखा गया इसमें। फिर पानदान को भी शामिल किया गया और कई पानदानी में इन पाचक मिश्रणों को रखने के इंतजाम किये गए तो इन्हें रखने के लिए चांदी या पीतल से सजे पानदान रखे जाते थे, जिन्हें अक्सर पारिवारिक विरासत के रूप में पीढ़ियों को सौंप दिया जाता था। इसलिए भी मुखवास की परंपरा आगे बढ़ती रही। 

पान दुकान की शोभा 

आज भी घरों के अलावा, पान दुकान की शोभा बढ़ाते यह मुखवास नजर आते हैं। दरअसल, 1900 के दशक के आरंभ में, गली-मोहल्लों की पान की दुकानें सामाजिक केंद्र बन गयी थीं, जहां मुखवास को घरों से बाहर भी लोकप्रिय बनाया गया और यह आम लोगों के लिए भोजन के बाद एक किफायती पारंपरिक व्यंजन बन गया।वहीं 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पैकेटबंद, चीनी कोटेड सौंफ और विभिन्न बीजों के मिश्रण का चलन बढ़ा, जिससे आम लोगों के लिए व्यंजनों को भी पहचान मिली, अब आज के दौर में तो कई तरीके से इसे बनाया जा रहा है और इन पारंपरिक आयुर्वेदिक अनुपातों को चॉकलेट, गुलाब या फलों के मिश्रण जैसे आधुनिक स्वादों के साथ मिलाया जाता रहा है। 

अलग-अलग राज्यों का अपना अंदाज 



अगर अलग-अलग राज्यों की बात करें, तो गुजरात में इसे बेहद शौक से खाया जाता है। गुजरात को दरअसल, मुखवास की राजधानी माना जाता है, यहां क्योंकि कई तरह के मुखवास मिलते हैं। यहां के मुखवासों में मुख्य रूप से बीजों को हल्दी और नमक के साथ भूनकर मीठे तत्वों के साथ मिलाया जाता है। यहां सबसे अधिक गोटली मुखवास, जो कि सूखे आम की गुठलियों से बना होता है, उसे और धना दाल, जो कि भुने हुए धनिये के बीज से बना होता है, उसे मिला कर खाया जाता है। वहीं नींबू, नमक और चीनी के मिश्रण से खट्टा-मीठा का अनूठा संतुलन बनता है। वहीं अगर राजस्थान की बात करें, तो यहां के मुखवास में शाही और मसालेदार मिश्रण बनता है और रेगिस्तान की गर्मी और शाही विरासत को दर्शाते हुए, राजस्थानी मिश्रण शरीर को ठंडक पहुंचाने के साथ-साथ तीखे स्वाद को बनाए रखने पर केंद्रित होते हैं। यहां राजवाड़ी मुखवास लोकप्रिय है, जिसमें अक्सर शरीर को ठंडक पहुंचाने के लिए भारी मात्रा में सूखे गुलाब की पंखुड़ियां (गुलकंद का स्वाद) डाली जाती हैं, और चांदी के अर्क के साथ मिलाया जाता है। उत्तर भारत में यह अक्सर पान में डाला जाता है, लखनवी सौंफ के रूप में यह लोकप्रिय है। दक्षिण भारत की बात करें, तो यहां मुखवास के रूप में पाचक अक्सर भोजन में शामिल होते हैं या "ताम्बुल" (सुपारी के साथ पान का पत्ता) के रूप में परोसे जाते हैं। वहीं भुना हुआ जीरा और अजवाइन, खूब नमक के साथ, कभी-कभी कसा हुआ नारियल मिलाकर खाया जाता है। 

गिफ्ट के रूप में खास 

अगर गौर करें, तो मुखवास उपहार एक लोकप्रिय विकल्प है, विशेष रूप से त्योहारों और विशेष अवसरों पर। खूबसूरती से पैक किए गए मुखवास के जार या तीखा मिठाई, घटिया मेवे और चॉकलेट के साथ उपहारों में शामिल हैं। ये उपहार पैक अच्छे स्वास्थ्य, समृद्धि और एक नई शुरुआत का प्रतीक हैं। त्योहारों के दौरान मुखवास में उपहार देने की परंपरा के सांस्कृतिक महत्व को भी बढ़ावा दिया जाता है। 






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