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जानें होली के दिलचस्प सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व के बारे में

टीम Her Circle |  March 01, 2026

होली से जुड़ीं कई दिलचस्प कहानियां और बातें हैं, जिनके बारे में आपको जरूर जानने की कोशिश करनी चाहिए। आइए जानते हैं विस्तार से। 

वसंत ऋतू का है त्यौहार 

सदियों पुरानी परंपरा में निहित, यह वसंत ऋतु का मुख्य त्यौहार है, जो कि सामाजिक बाधाओं को तोड़ता है, एकता को बढ़ावा देता है और जैमिनी के पूर्वमीमांसा-सूत्र और नारद पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। इस पर्व का उल्लेख चौथी शताब्दी में कालिदास की रचनाओं और सातवीं शताब्दी के नाटक रत्नावली में मिलता है। इसे 16वीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हम्पी की मूर्तियों में दर्शाया गया है। साथ ही अगर इसके ऐतिहासिक रूप को देखें तो होली सामाजिक बाधाओं को तोड़ने का दिन था, जिससे सभी पृष्ठभूमि, उम्र और लिंग के लोग एक साथ आ सकें, एक दूसरे को माफ कर सकें और पुरानी शिकायतों को भूल सकें। 

पारंपरिक रंगों का है अपना महत्व 

गौरतलब है कि एक दौर में पुराने दौर में होली खेलने के लिए पारंपरिक रंगों का इस्तेमाल होता था। परंपरागत रूप से, मौसम का जश्न मनाने के साथ-साथ औषधीय लाभ प्रदान करने के लिए नीम, हल्दी, बिल्व और कुमकुम जैसे प्राकृतिक स्रोतों से रंग बनाए जाते थे और लोग इनका इस्तेमाल आपस में होली मनाने के लिए करते थे। 

महिलाओं का त्यौहार 

जानें इस बात को भी कई शताब्दियों पहले अपने प्रारंभिक रूप में, होली, जिसे तब होलाका के नाम से जाना जाता था और मुख्य रूप से विवाहित महिलाओं द्वारा अपने परिवारों के लिए सुख और कल्याण की कामना करने के लिए किया जाने वाला एक पर्व माना जाता था। एक मान्यता यह भी है कि 19वीं शताब्दी के पंजाब में, एक विशिष्ट परंपरा में दूसरों के साथ मौज मस्ती करना शामिल था और एक ऐसी प्रथा जिसे मानवविज्ञानी ने इस क्षेत्र में त्यौहार के ऐतिहासिक उत्सव के लिए अद्वितीय होने के रूप में प्रलेखित किया है। यह भी जानें कि बरसाना में एक अनूठा ऐतिहासिक संबंध आज भी कायम है, जहां महिलाएं कृष्ण की शरारतों से अपने गांव की रक्षा करने की परंपरा को दोहराती हैं और लाठियों से पुरुषों का पीछा करती हैं (लठमार होली)। यह प्रथा त्योहार के दौरान प्राचीन सामुदायिक लैंगिक संबंधों का एक जीवंत अवशेष है। साथ ही यह जानें कि इस पर्व का कृषि से भी संबंध है, क्योंकि यह त्योहार वसंत ऋतु की फसल कटाई के साथ मेल खाता था, और महिलाओं ने उन अनुष्ठानों में केंद्रीय भूमिका निभाई जो भूमि की उर्वरता और नए जीवन के खिलने का आह्वान करते थे।

जानें बनारस की होली के बारे में 

वाराणसी में बहुत ही धूमधाम से होली का त्यौहार मनाया जाता है, इसमें रंगभरी एकादशी से शुरुआत होती है, जिसमें यह दिन भगवान शिव और देवी पार्वती के विवाह के बाद काशी लौटने की पौराणिक कथा का प्रतीक है। भक्त काशी विश्वनाथ मंदिर में एकत्रित होकर देवताओं पर रंग-बिरंगा गुलाल और फूलों की पंखुड़ियां चढ़ाते हैं। वहीं रंगभरी एकादशी के अगले दिन मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाटों पर आयोजित इस अनुष्ठान में दाह संस्कार की चिताओं की राख से खेला जाता है। वहीं होली की पूर्व संध्या पर विभिन्न घाटों पर एक विशाल अग्नि प्रज्वलित की जाती है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। वहीं रंगवाली होली में रंगों से खेलने का यह अंतिम दिन है, जो शहर की संकरी गलियों और घाटों पर मनाया जाता है। कुछ ऐतिहासिक लेख पढ़ें, तो उसमें इसका उल्लेख है कि इस क्षेत्र के मुगल शासक इस त्योहार को ईद-ए-गुलाबी कहते थे।

छत्तीसगढ़ कनेक्शन



अगर हम होली के बारे में या संस्कृति के बारे में और जानना चाहते हैं, तो हमें यह भी समझना होगा कि इस उत्सव का सबसे प्राचीन भौतिक उल्लेख छत्तीसगढ़ की सीताबेंगा गुफाओं में मिलता है। लगभग 300 ईसा पूर्व के एक शिलालेख में होलिकोत्सव का जिक्र है। इसमें एक "झूला उत्सव" का वर्णन है, जिसमें लोग चमेली की माला पहनते थे और संगीत और मौज-मस्ती का आनंद लेने के लिए एक प्राचीन रंगमंच पर एकत्र होते थे।

होला मोहल्ला 

यह जानना भी दिलचस्प है कि गुरु गोबिंद सिंह ने इस परंपरा को संशोधित करते हुए होला मोहल्ला का रूप दिया, जो होली के अगले दिन मनाया जाने वाला तीन दिवसीय मार्शल आर्ट, तीरंदाजी और मॉक बैटल्स का त्यौहार है। यह जानना भी अपने आप में एक बड़ी दिलचस्प बात है, जिसे जरूर जानने की कोशिश करनी चाहिए और याद रखना चाहिए, ताकि आप आगे भी अगली जेनेरेशन को ये बातें बता सकें। 

कवियों की होली 

यह जानना भी आपके लिए रोचक है कि अमीर खुसरो, बुल्ले शाह और बहादुर शाह जफर जैसे सूफी और उर्दू कवियों ने होली की प्रशंसा में विस्तृत छंद लिखे, अक्सर इस त्योहार को आध्यात्मिक प्रेम और धार्मिक पहचान के विघटन के रूपक के रूप में इस्तेमाल किया।

एक होली ऐसी भी 

एक बड़ा बदलाव इस दौरान यह भी हुआ कि वृंदावन में सदियों पुरानी सोच बदली और वर्ष 2013 से, वे महिलाएं, जिन्हें अपने पति को खोने के बाद होली मनाने की इजाजत नहीं थी, उन्हें होली समारोह में आधिकारिक रूप से भाग लेना शुरू कर दिया है, और वे फूल की पंखुड़ियों और गुलाल से होली मनाने लगी हैं। 




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