बिहार की बिदेसिया लोक संस्कृति के बारे में कुछ बातें आपको जरूर जाननी चाहिए। आइए जानते हैं विस्तार से।
क्या है बिदेसिया
एक खास बात आपको जरूर समझने की जरूरत है कि बिदेसिया बिहार की संस्कृति की अनूठी संस्कृति में से एक है और यह बिहार के भोजपुरी भाषी क्षेत्र का एक लोकप्रिय लोक नृत्य-नाटक और थिएटर परंपरा है, जिसे भिखारी ठाकुर ने शुरू किया था। इसमें संगीत, भावपूर्ण हाव-भाव और दमदार कहानी कहने की कला का अनूठा संगम है, जो पलायन के गहरे भावनात्मक दर्द और सामाजिक असमानताओं को दर्शाता है। इसकी शुरुआत 20वीं सदी की शुरुआत में भिखारी ठाकुर के कामों से हुई, जिन्हें अक्सर "भोजपुरी का शेक्सपियर" कहा जाता है। यह उन गांव की महिलाओं के दुख-दर्द पर केंद्रित है, जिनके पति काम के लिए दूर-दराज के शहरों में चले जाते हैं।
खासियत
आपको यह भी जानने की जरूरत है कि यह जातिगत भेदभाव, गरीबी, लैंगिक असमानता और ग्रामीण और शहरी जीवनशैली के बीच टकराव जैसे व्यापक मुद्दों को उठाता है। इस संस्कृति में परफॉर्मेंस का तरीका और किरदारों की भूमिका अहम होती है। पारंपरिक रूप से इसे पूरी तरह से पुरुष ही करते हैं। वे साड़ी पहनते हैं और नकली लंबे बाल लगाकर पुरुष किरदारों के साथ महिला किरदारों की भूमिका निभाते हैं। अगर इसमें संगीत और वाद्य यंत्र की बात करें, तो इसमें बिरहा गीतों पर आधारित पारंपरिक लोक धुनों का इस्तेमाल होता है, साथ ही ढोलक, तबला, हारमोनियम और बांसुरी जैसे वाद्ययंत्र बजाए जाते हैं। वही अगर मंच की सजावट की बात करें, तो पारंपरिक रूप से इसे रात में खुले में या एक साधारण ऊंचे मंच पर किया जाता है, जिसमें स्थानीय लाइटिंग और पारंपरिक वेशभूषा का इस्तेमाल होता है।
पलायन का दर्द
अगर हम 'बिदेसिया' शब्द के मूल अर्थ है की बात करें, तो प्रवासी या वह व्यक्ति जो परदेस जाता है, उन्हें कहा जाता है और पारंपरिक रूप से, इन प्रस्तुतियों में उन स्थानीय मजदूरों की कठोर आर्थिक सच्चाइयों और भावनात्मक संघर्षों को दिखाया जाता है, जो ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान कोलकाता जैसे शहरों या विदेशों में काम करने के लिए गए थे। इनके बारे में कुछ बातें आपको इस तरह से भी समझनी है कि पलायन का दर्द लोग नृत्य नाटक के रूप में भी दर्शाते हैं। यहां उन ग्रामीणों के दर्द को दिखाने की कोशिश की गई है, जो रोजी-रोटी की तलाश में अपना घर पीछे छोड़ जाते हैं। इसमें बिरह का गीत भी सुनाई देता है, जो एक महिला पीछे रह गई, उनके गहरे दुःख और तड़प को दिखाया जाता है और साथ ही घरेलू परेशानियों को भी दिखाया जाता है। गौरतलब है कि इसमें बिछड़ने के बेहद भावुक गीत, जो इस नृत्य की लय और बोल को दर्शाता है।
बात सिर्फ इतनी-सी नहीं है
गुलामी-प्रथा के खात्मे से जुड़ी ऐतिहासिक रिसर्च बताती है कि बिदेसिया लोक-परंपरा 19वीं और 20वीं सदी में हुए भू-राजनीतिक बदलावों के साथ-साथ सीधे तौर पर विकसित हुई। गौरतलब है कि 1833 के ब्रिटिश गुलामी-उन्मूलन कानून के बाद, यूरोपीय उपनिवेशों ने गुलाम अफ्रीकी मज़दूरों की जगह भारतीय इंडेंचर मजदूरों को रख लिया। रिसर्च प्रोजेक्ट्स का अनुमान है कि 20 लाख से ज़्यादा भारतीय—जिनमें ज्यादातर भोजपुरी इलाके के गरीबी और लगातार पड़ने वाले अकाल से भागने वाले निचली जाति के मजदूर थे, वहीं कलकत्ता जैसे शहरों या विदेशों में फिजी, मॉरिशस, सूरीनाम और त्रिनिदाद चले गए। बिदेसिया पीछे छूट गए परिवारों की एक अनोखी लोक-स्मृति बन गयी।
जान लें यह भी
पारंपरिक हिंदी कविता के विपरीत, जो मात्राओं (मैट्रिक) पर आधारित होती है, भिखारी ठाकुर ने अपने संवादों के लिए एक वर्ण-आधारित (वर्णिक) संरचना बनायी। इस अनोखे छंद में हर पंक्ति में ठीक 32 वर्ण होते हैं, जो शास्त्रीय संस्कृत कविता (घनक्षरी छंद) की संरचनात्मक जटिलता की नकल करते हुए लोक संवाद को एक ओपेरा जैसी लय देते हैं। लोक विधाओं का मिश्रण: एक ही प्रस्तुति में कई पारंपरिक संगीत शैलियों को एक साथ पिरोया जाता है, जिनमें बिरहा यानी विरह के गीत, कजरी यानी मानसून के गीत, फगुआ यानी होली के गीत, पूर्वी और निर्गुण यानी दार्शनिक लोक धुनें शामिल हैं।
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