छोटे शहरों में कामकाजी महिलाएं कैसे मना रही हैं 'इको-फ्रेंडली' और आधुनिक त्योहार, आइए जानते हैं विस्तार से।
कम कचरे पर फोकस

छोटे शहरों की महिलाएं पारंपरिक और कम कचरा पैदा करने वाले तरीकों को अपनाकर पर्यावरण के अनुकूल त्योहारों को बढ़ावा देती हैं। जी हां, यह ट्रेंड अभी बच्चों का खूब शुरू हुआ है और वे खासतौर कर कई तरीके अपना रही हैं कि वे कम से कम पर्यावरण को नुकसान पहुचाएं। ऐसे में वे मिट्टी की मूर्तियां और प्राकृतिक रंग बनाने के लिए प्रैक्टिकल वर्कशॉप आयोजित करने लगी हैं, साथ ही सिंगल-यूज प्लास्टिक की जगह बायोडिग्रेडेबल पत्तों से बने बर्तनों का इस्तेमाल करती हैं, और फूलों के कचरे से खाद बनाने के लिए सामुदायिक अभियान चलाती हैं। वहीं जमीनी स्तर की यह पहल सांस्कृतिक विरासत को बचाते हुए समुदाय में जिम्मेदारी की भावना को बढ़ावा देती हैं।
पारंपरिक विकल्प
महिलाओं को यह पूरा ख्याल रहता है कि मूर्तियां और पौधे उगने वाली बीज वाली राखियां और फूलों से होली के प्राकृतिक रंग जैसी बायोडिग्रेडेबल (आसानी से नष्ट होने वाली) चीजें बनाने के लिए वर्कशॉप आयोजित करना ही सही रहता है और टिकाऊ सजावट और खान-पान का भी पूरा ध्यान रखा जा रहा है, साथ ही हानिकारक प्लास्टिक और थर्मोकोल की जगह दोबारा इस्तेमाल होने वाले कपड़े के बैनर, ताजे फूल और पारंपरिक पत्तों की प्लेटों का इस्तेमाल किया जा रहा है और तो और फूलों से खाद बनाना भी शुरू कर दिया गया है और त्योहारों और मंदिरों में चढ़ाए गए फूलों के कचरे को इकट्ठा करके और उससे खाद बनाकर जैविक खाद तैयार करना भी महत्वपूर्ण कौशल समझा जा रहा है और नई पीढ़ी को टिकाऊ क्राफ्टिंग सिखाना, जिससे ग्रामीण कारीगर आर्थिक रूप से सशक्त हों और पर्यावरण के प्रति जागरूक सोच को बढ़ावा मिले। इस पर भी पूर्ण रूप से काम किया जा रहा है।
नीति एवं व्यवहार संबंधी वकालत

महिलाएं मिल कर पड़ोस में ऐसी समितियां गठित कर रही हैं, जो प्लास्टिक के उपयोग पर छोटे जुर्माने लगाने की वकालत करता है और साथ ही उन परिवारों को सार्वजनिक रूप से पुरस्कृत करें, जो सबसे अधिक टिकाऊ घरेलू सजावट प्रदर्शित करते हैं। इनके अलावा, स्थानीय बाजार विक्रेताओं को प्लास्टिक के थैलों के स्थान पर कागज की पैकेजिंग या महिला स्वयं सहायता समूहों द्वारा सिले हुए कपड़े के थैलों का उपयोग करने के लिए मनाने में भी जुटी हैं और नुक्कड़ नाटक के प्रति जागरूकता फैलाई जा रही हैं और स्थानीय नुक्कड़ नाटकों (नुक्कड़ नाटक) का लेखन और प्रदर्शन किया जा रहा है।
कम्युनिटी गारबेज ऑडिट
अब महिलाएं इस बात का ध्यान फेस्टिवल में रख रही हैं कि गंदगी इधर-उधर न फैले, बल्कि अलग-अलग तरह के कचरे के लिए ग्रीन बूथ बनाया जा रहा है और जहां महिला वॉलंटियर कचरे के निपटान की निगरानी करती हैं और सूखे प्लास्टिक को सीधे स्थानीय रीसाइक्लिंग सेंटरों तक पहुंचाती हैं, तो कई महिलाएं सजग होकर यह सारे काम कर रही हैं। इनके अलावा, सूखे पत्तों (जैसे साल या बरगद) और बांस की खपच्चियों से इस्तेमाल के बाद डिस्पोजेबल प्लेट और कटोरे बनाने के पारंपरिक हुनर को फिर से जीवंत रखने की कोशिश हो रही है। साथ ही नॉन-बायोडिग्रेडेबल फ्लेक्स या प्लास्टिक के बजाय कपड़ों के कचरे और पुरानी साड़ियों का इस्तेमाल करके त्योहारों के लिए बैनर, झालर और स्टॉल के बैकड्रॉप बनाया जा रहा है।
ऊर्जा एवं संसाधन संरक्षण सामुदायिक रसोई

स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जैविक सामग्रियों का उपयोग करके सामुदायिक भोज पकाने के लिए साझा मेगा-रसोइयों का आयोजन करना, जिससे व्यक्तिगत रूप से लकड़ी या एलपीजी का उपयोग कम हो जाता है। साथ ही पारंपरिक चीजों को महत्व दिया जा रहा है, जैसे कि पारंपरिक तेल का दीपक इस्तेमाल किया जा रहा है, वहीं बिजली की अधिक खपत करने वाले या सस्ते प्लास्टिक के सजावटी दीयों को स्थानीय स्तर पर उत्पादित जैविक तेलों से जलने वाले हस्तनिर्मित मिट्टी के दीयों से बदला जा रहा है और साथ ही कृत्रिम जल कुंड बनाये जा रहे हैं, जैसे कि गणेश विसर्जन जैसे अनुष्ठानिक विसर्जन के लिए अस्थायी सामुदायिक कुंडों का निर्माण किया जा रहा है।