कोविड के दौर में जब पापा बोकारो में अकेले थे, हम बेटियां अलग-अलग शहरों में, वहां जाना किसी के लिए संभव नहीं था। ऐसे में थोड़ा इत्मीनान भी था, क्योंकि इस बात से वाकिफ रही कि अब भी छोटे शहरों में पड़ोसी एक दूसरे का ख्याल रखने के लिए काफी होते हैं, जी हां, आज भी छोटे शहरों में चीनी घटने पर तुरंत किराने की दौड़ नहीं, बगल वाली आंटी के घर की ही तरफ रुख करते हैं, कोई अच्छी सब्जी या पकवान बने, तो उसका स्वाद बगैर पड़ोसियों संग बांटे, पूरा नहीं लगता है, तो आइए बताते हैं, क्यों छोटे शहरों में आज भी पड़ोसी कल्चर है जिंदा।
आज भी भावना यानी इमोशन है जरूरी

छोटे शहरों में आज भी लोगों ने भावनाओं को जिंदा रखा है। लोग एक दूसरे के सुख-दुःख दोनों में शरीक होने के लिए आज भी कारण नहीं ढूंढते हैं, एक दूसरे के लिए हमेशा खड़े रहने में विश्वास करते हैं। लोग अधिक लाग-लपेट में नहीं रहते हैं, अधिक हिसाब-किताब करना आज भी यहां की नीयत में शामिल नहीं है, लोग एक दूसरे के लिए कुछ भी करने के लिए समय या पैसों को मोहताज नहीं बनाते हैं।
सीखनी चाहिए शेयरिंग की कला

छोटे शहरों में आज भी कोई अच्छी सब्जी बनती हो या पड़ोस में किसी के बच्चे ने परीक्षा पास की हो या फिर कोई पकवान बने हो, एक दूसरे के घर में आदान-प्रदान होता है, खासियत यह भी है कि बर्तन को वापस को खाली नहीं, बल्कि उसमें कुछ भर कर खाने की चीज भेजी ही जाती है। पुए पकवान से लेकर अगर कुछ भी नयी चीज बनती है तो एक दूसरे के साथ लोग शेयर करते ही हैं। ऐसे में स्पष्ट है कि आज भी छोटे शहरों से शेयरिंग की कला तो जरूर सीखनी चाहिए।
जरूरत पड़ने पर होते हैं खड़े

आज भी अगर छोटे शहर में कोई बीमार पड़ जाता है, तो आधी रात में भी पड़ोसियों को बेझिझक कॉल करने में किसी को भी परेशानी नहीं होती है, सभी मिल कर फिर अस्पताल लेकर जाते हैं, आज भी अगर कोई बाहर जा रहा होता है वहां, तो उन्हें एक तसल्ली होती है कि बगल के पड़ोसी हैं, पूरा ध्यान घर का भी और बुजुर्गों का भी रख लेंगे। आज भी एक-दूसरे के घर आने के लिए कॉल करने की जरूरत नहीं होती है। यही छोटे शहरों को आज भी बड़े शहरों की भीड़ में अलग खड़ा करती है।
गपशप का दौर

आज भी ऐसे कई छोटे शहर हैं, जहां एक ही अखबार आता है और पूरा मोहल्ला पढ़ता है इसे। जी हां, छोटे शहरों के अखबार और जज्बात एक ही होते हैं, जिन्हें सभी मिल कर बांट लेते हैं। आज भी यहां ठंड में मोहल्ले की आंटियां एक साथ धूप में बैठती हैं और बातों-बातों में पूरे परिवार के लिए ऊनी कपड़े कब बन कर पूरे हो जाते हैं, पता नहीं चलता है। आज भी गपशप, दुःख-दर्द बांटने के लिए आपको सिर्फ अपनों की नहीं, पड़ोसियों का भी ख्याल रहता है।
कोई समारोह पूरे मोहल्ले का समारोह होता है

शादी भले ही किसी एक घर में हो, सभी अपने घर के एक-एक कमरे खाली कर देते हैं कि किसी को भी गेस्ट हॉउस की जरूरत न हो, सभी एडजस्ट करने में यकीन करते हैं, ऐसे में शादी के जरूरी काम कब निपट जाते हैं, पता नहीं चलता है, कोई नयी फिल्म लगी है, तो सिनेमाहॉल में फिल्म देखना भी किसी समारोह से कम नहीं हुआ करता था, ठंड में कबड्डी, खो-खो, बैडमिंटन खेलना भी हर दिन का जश्न था, यहां जश्न मनाने के लिए किसी जश्न को होना जरूरी नहीं हुआ करता था।