गुड़ की मिठास ने अपनी हर भाषा और हर प्रांत में अपने स्वाद का जादू बिखेरा है। गुड़ एक ऐसा खाद्य पदार्थ है, जो कि हर राज्य में हर किसी के खाने में मिठास का अपनापन कई सदियों से घोलते हुए नजर आ रही है। हम गुड़ से जुड़ी यूपी, बिहार, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र की संस्कृति को जानेंगे। गुड़ एक तरह से कसैली चीनी होता है, भारतीय पाक संस्कृति में सिर्फ एक मीठी सामग्री नहीं है, बल्कि परंपरा, स्वास्थ्य और स्थानीयता का प्रतीक है। इसका उपयोग केवल मिठाई बनाने में नहीं होता है, बल्कि चटनी, मसालों और खाने के स्वाद संतुलन और अच्छे अवसरों के लिए भी किया जाता है। आइए जानते हैं विस्तार से।
गुड़ से जुड़ा रसोई कला का इतिहास

गुड़ का रसोई के इतिहास में उल्लेख वेदों में मिलता है, खासतौर पर ऋग्वेद यानी कि 1500 ई.पू. में जहां अपूप नामक एक मीठा व्यंजन का वर्णन है, जो कि गेहूं के आटे और गेहूं से बनाया जाता है। आयुर्वेदिक ग्रंथों जैसे चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में भी गुड़ का उल्लेख औषधीय गुणों के साथ मिलता है। खासतौर से पाचन में सहायक, खांसी, जुकाम और थकान दूर करने में उपयोगी माना गया है। प्राचीन काल की भारतीय रसोई में गुड़ को शुद्धता और ऊर्जा का स्रोत माना जाता था। मौर्य और गुप्त काल काल में रसोई कला और भोज परंपराएं विकसित हुईं। गुड़ से बनी मिठाईयां जैसे लड्डू, अप्पे, पकवान, पायस यानी कि खीर लोकप्रिय होने लगी। उल्लेखनीय है कि चाणक्य के अर्थशास्त्र में गुड़ का उल्लेख कर लग एवं व्यापार के संदर्भ में इकी महत्ता बताई गई है। मध्यकालीन भारत में यानी की 700 से 1700 ईं और क्षेत्रीय व्यंजन बन गया। इस समय तक गुड़ पूरे भारत में लोकप्रिय हो चुका था और हर क्षेत्र में अपनी स्थानीय पाकशैली में इसे अपनाया है। ज्ञात हो कि इस काल में गुड़ की मिठास को भक्ति आंदोलन के कवियों द्वारा भी रूपक तौर में प्रयोग किया गया है, जैसे कि मीराबाई, तुलसीदास ने प्रेम की मिठास को गुड़ से जोड़ा है।
अंग्रेजों के जमाने में गुड़ का स्थान

अंग्रेजों के आगमन के बाद शक्कर के उत्पादन को बढ़ावा मिला है, लेकिन गुड़ हमेशा से रसोई का हिस्सा बना रहा है। इसकी वजह यह है कि गुड़ सस्ता था। इसके अलावा गुड़ पौष्टिक और प्राकृतिक था और भावनात्मक-सांस्कृतिक रूप से जुड़ा हुआ था। अंग्रेजी के समय में भी शक्कर के बजाय गुड़ का उपयोग अधिक होता रहा है। शक्कर खरीदना उस दौरान लग्जरी माना जाता था। गुड़ की पैदावार आसानी से हो जाती थी। इस दौर में भी त्योहारों में गुड़ का उपयोग बना रहा है। खासतौर से होली में गुड़ की मिठाई, संक्रांति में तिल-गुड़, छठ में ठेकुआ आदि पारंपरिक व्यंजन बनाया जाता है।
उत्तर प्रदेश में गुड़ का स्वाद

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरपुर में गुड़ का अधिक उत्पादन होता है। यह गुड़ मुजफ्फरपुर, बिजनौर, शामली, बागपत, मेरठ और शाहजहांपुर जिलों में बनने वाला प्रमुख प्रकार है। देश में कुल गुड़ उत्पादन में यह क्षेत्र लगभग 20 प्रतिशत योगदान देता है और इसे वहां के लिए भाग्यवर्धक माना जाता है। उत्तर प्रदेश में पारंपरिक मिठाई बालूशाही गुड़ या शक्कर में डुबोकर बनाई जाती है, इसे उत्तर प्रदेश की लोकप्रिय मिठाई में माना जाता है। इसके अलावा गुड़ का उपयोग लस्सी, दल और पराठों के साथ गूंदने के लिए भी किया जाता है। सर्दियों में गर्म रोटी पर गुड़-घी का संयोजन बहुत लोकप्रिय है। चूरमा को भी त्योहार की परंपरा का खास हिस्सा माना जाता है, जो कि गुड़ के साथ गेहूं के टुकड़ों को घी में कुचलकर बनता है। इसे आमतौर पर दाल और घी के साथ परोसा जाता है। बिहार में गुड़ की मिठास की संस्कृति

बिहार के त्योहारों में भी गुड़ को खास स्थान मिला है। बिहार में ठेकुआ का खास स्थान है। यह छठ पूजा का प्रमुख प्रसाद माना गया है और इसका इतिहास ऋग्वैदिक काल में 1500-1000 ई. पू. से जुड़ा माना जाता है। गेहूं के आटे, गुड़, घी और इलायची से बने पकवान को खास लकड़ी की सांचे से आकार देकर फ्राई किया जाता है, यह लंबे समय तक ताजा रहता है। तिलकुट, बिहार का पारंपरिक मिठाई, तिल और गुड़ से बनता है और मकर संक्रांति के समय अत्यधिक लोकप्रिय होता है। खासतौर पर बिहार के गाया क्षेत्र का तिलकुट खासतौर पर लोकप्रिय है, इसका इतिहास लगभग 150 साल पुराना है। सेहत के हिसाब से देखा जाए, तो तिलकुट में जिंक, मैग्नीशियम, कैल्शियम और एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, जो कि महिलाओं और हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए खास तौर से फायदेमंद है।
राजस्थान में गुड़ की मिठाई का परंपरा में योगदान

राजस्थान की घेवर मिठाई दिवाली और तीज के साथ खास मौके पर बनाई जाती है। राजस्थान की यह एक पारंपरिक मिठाई है। यह मैदे के घोल का गोल डिस्क होता है, जिसे गहरे तलने के बाद शक्कर के सिरप, रबड़ी और ड्राई फ्रूट से सजाया जाता है। गुड़ के विकल्प में कई लोग शक्कर का प्रयोग करते हैं। राजस्थान के घरों में चूरमा भी काफी लोकप्रिय है। चूरमा बची हुई बाटी या रोटी को घी और गुड़ के साथ कुचलकर बनता है। यह लगभग मिठाई का रूप लेता है और दाल-बाटी के साथ सर्व किया जाता है। राजस्थान को कहीं न कहीं मिठाई में गुड़ की जगह अक्सर शक्कर का उपयोग होता है, लेकिन कुछ पारंपरिक रेसिपी जैसी रबड़ी-घेवर के मिश्रण में स्वाद और मिठास दोनों के लिए गुड़ भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
गुजरात की मिठास में गुड़ का पारंपरिक स्वाद

गुजरात की पाक संस्कृति में गुड़ का व्यापक उपयोग होता है। जैसे कि खट्टी-मीठी दाल, हैंडवा और मीठी पूरी में गुड़ का उपयोग होता है। इसके अलावा, गुड़ की कतियों और धनिया के साथ मिलाकर गोल-धाणा बनाया जाता है। यह खास तौर से शादी के समय पर बनाया जाता है। इसके अलावा गुजरात के साथ देश में लोकप्रिय मोहनथाल में भी गुड़ का इस्तेमाल किया जाता है। मोहनथाल में बेसन, घी और शक्कर के साथ गुड़ से बनने वाली रेसिपी है, जो गुजरात में शादी-विवाह और त्योहारों में खास स्थान रखती है।
गुड़ का आयुर्वेद की संस्कृति में योगदान
आप भले ही गुड़ को एक नाम से जानते हैं। लेकिन आयुर्वेद की संस्कृति में गुड़ को कई तरह के नाम से जाना जाता है। संस्कृत में गुड़ को शर्करा, गौड़ भी कहते हैं। आयुर्वेद के अनुसार गुड़ शरीर को गर्मी प्रदान करता है। गुड़ खून को साफ करने का काम भी करता है। साथ ही यह शरीर के अंदर मौजूद वात, पित्त और कफ को भी संतुलित करने का काम करता है। यहां तक कि मासिक धर्म में भी गुड़ सहायक होता है। पीरियड्स के दौरान पेट में होने वाले दर्द से गुड़ राहत देता है। साथ ही अगर किसी को अधिक थकान होती है, तो उसके लिए भी गुड़ का सेवन सही माना गया है। वात, पित्त और कफ के जरिए देखा जाए, तो गुड़ का सेवन वात को शांत करता है, जोड़ों के दर्द से भी राहत देता है। शरीर में पित्त को भी संतुलित करने का काम गुड़ करता है। गर्म गुण का सेवन कफ से भी राहत देता है। आयुर्वेद में गुड़ को सात्विक आहार कहा जाता है। आयुर्वेद में गुड़ केवल एक मीठा पदार्थ नहीं है, बल्कि इसे औषधीय रसायन, सांस्कृतिक आहार और स्वस्थ जीवनशैली का अंग माना गया है। गुड़ का सेवन शरीर, मन और आत्मा को संतुलित रखने में मदद करता है।