मेहंदी सुनते ही, तीज और त्योहारों की महक महसूस होती है। लेकिन क्या आप जानती हैं कि भारतीय संस्कृति और कला के साथ प्राचीन जमाने से मेहंदी का महत्व दिखाई और सुनाई पड़ता है। मेहंदी यानी कि हिना का भारतीय संस्कृति के साथ पुराना और गहरा नाता रहा है। यह नाता ऐसा ही रहता है जैसे कि मेहंदी का रंग हाथों पर कलाकृति की गहराई लाता है। मेहंदी का इतिहास हजारों साल पुराना माना जाता है। आइए जानते हैं विस्तार से।
कैसे आया मेहंदी शब्द

मेहंदी शब्द संस्कृत के शब्द मेंधिका से लिया गया है। पश्चिम इलाके में इसे खासतौर पर हेन्ना के नाम से जाना जाता है, जो कि लॅासनिया इनर्मिस नामक की झाड़ी से मिलता है, जिसे अक्सर मेहंदी का पेड़ कहा जाता है। जो कि अफ्रीका, उत्तरी आस्ट्रेलिया और दक्षिण एशिया के क्षेत्रों में खासतौर पर पनपता है। ध्यान दें कि कई सारे प्राचीन ग्रंथों में मेहंदी का जिक्र मिलता है। कई सारे जानकारों का मानना है कि मेहंदी का उपयोग प्राचीन जमाने में होता था, ग्रंथों में इससे जुड़े कई सारे संकेत मिलते हैं। हालांकि मेहंदी का सबसे खास उपयोग वक्त के साथ केवल भारती में किया जाने लगा और इसे खासतौर पर भारतीय पंरपरा का हिस्सा मान लिया गया। हिना शब्द मेहंदी का पश्चिमीकृत रूप है। इसे हिना टैटू या हिना आर्ट जैसे नामों से बढ़ावा दिया जाता है।
मेहंदी यानी कि हिना का प्राचीन इतिहास

उल्लेखनीय है कि मेहंदी का सबसे प्रारंभिक इस्तेमाल प्राचीन मिस्त्र में पाया जाता है। जहां पर खासतौर पर ममी के बालों और नाखूनों को रंगने के लिए हिना का इस्तेमाल किया जाता।। इसके साथ मेंहदी का उपयोग वैदिक काल से भी किया जाता रहा है। दवाई बनाने या फिर सौंदर्य के लिए भी मेहंदी का इस्तेमाल किया जाता। मेहंदी का पौधा गर्म क्षेत्रों में उगता है। इस वजह से भारत, मध्य-पूर्व और अफ्रीका में प्राचीन जमाने में इसका उपयोग किया जाता रहा है। खासतौर पर मेहंदी की पत्तियों को तोड़कर , अच्छी तरफ साफ करने के बाद हाथ और पैरों में लगाया जाता। खासतौर पर गर्मी के मौसम में शरीर के अंदर की गर्म तासीर को ठंडा करने के लिए मेंहदी का उपयोग किया जाता है। इससे शरीर को शीतलता मिलती है और यह सिरदर्द, जलन और घावों के इलाज में लाभदायक माना गया है। इतिहास में यह भी दर्ज किया गया है कि 12वीं शताब्दी के दौरान मुगलों द्वारा भी इसका इस्तेमाल किया जाता रहा है।
मेहंदी का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बताएं विस्तार से

मेहंदी का धार्मिक महत्व सदियों से चला आ रहा है। भारतीय उपमहाद्वीपीय और मध्य पूर्वी संस्कृतियों में सौभाग्य, उर्वरता और प्रेम का गहरा प्रतीक माना गया है। मेहंदी एक तरह से हमारे हाथ और पैर के साथ जीवन को भी शीतलता देती है। ऐसा माना गया है कि एक तरह से नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा देने वाली और समृद्धि लाने वाला एक पवित्र पौधा माना गया है। आपको यह जानकर भी हैरानी होगी कि प्राचीन काल से ही मेहंदी बुरी आत्माओं से सुरक्षा और सौभाग्य लाने वाली माना जाता रहा है। आप यह भी समझ सकते हैं कि जैसे आज के जमानें में टैटू का का चलन है, ठीक इसी तरह पुराने जमाने में टैटू का मतलब मेहंदी से शुरू और मेहंदी पर खत्म होता था। इससे कोई अनजान नहीं है कि विवाह और त्योहारों में मेहंदी केवल रस्म नहीं बल्कि धर्म की तरह माना गया है। मेहंदी को भारतीय समाज में नारी सौंदर्य और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। विवाहित महिलाओं के लिए यह विशेष महत्व रखती है, क्योंकि यह उनके सुहाग और खुशहाल वैवाहिक जीवन का संकेत मानी जाती है।
मेहंदी में रची बसी कला और रचनात्मक अभिव्यक्ति इस पर विस्तार से

मेहंदी न केवल सुंदरता का प्रतीक है, बल्कि कला और रचनात्मक अभिव्यकित को भी दिखाई है। मेहंदी की कलात्मकता और रचनात्मकता स्वरूप की बात की जाए, तो पेस्ले, मोर, फूल, पत्तियां और जालीदान पैटर्न का उपयोग मेहंदी में किया जाता है। मेहंदी में कई सारे बारीक आकार और डिजाइन बनाए जाते हैं। मेहंदी की कला त्योहार के हिसाब से खुद को ढालती है। मेहंदी लगाने वाले कलाकार अपनी कला का परिचय देते हुए शादी के दौरान वधू की आकृति, त्योहारों के दौरान उससे जुड़ी आकृति को पेश करती है। मेहंदी को हाथों और पैरों पर उतारने के लिए कोन या फिर ब्रश की सहायता से लगाया जाता है। इससे मेहंदी से बारीक डिजाइन खूबसूरती से बनाई जाती है। इस तरह से कहीं न कहीं कला और रचना के मेल से अभिव्यक्ति के विचारों को उसकी खुशियों को मेहंदी में शुभ मानकर पिरोया जाता रहा है और आज भी यह परंपरा और कला शामिल है।