कई बार किसी चीज की क्वालिटी के साथ समझौता हम इस शर्त पर कर लेते हैं कि हमें यह चीज सस्ती मिली है, लेकिन बाद में वही सस्ती चीज बार-बार खराब होती है और आपको दोगुना खर्च करना पड़ता है, इसलिए जरूरी है कि सस्ते के चक्कर में अपना फाइनेंस खराब न करें। आइए जानते हैं विस्तार से।
क्या है फॉल्स इकोनॉमी

एक कहावत है कि महंगा रोये एक बार, सस्ता रोये बार-बार, इसका मतलब यह है कि सस्ते के चक्कर में आपने खराब चीज खरीद ली है और अब आपको उसे ठीक करवाने में या मरम्मत करने में बार-बार खर्च करना पड़ रहा है। इसलिए बेहद जरूरी है कि आपको ऐसी चीजों को खरीदने से बचना चाहिए। इसे ही फॉल्स इकोनॉमी या झूठी अर्थव्यवस्था कहते हैं। जैसे अंग्रेजी में इसे यही कहा जाता है कि जब आप पैसे बचाने के लिए ऐसे निर्णय लेते हैं, जिससे अंत में आपका खर्चा और बढ़ोतरी हो जाती है, तो उसको ही फॉल्स इकोनॉमी कहा जाता है। एक और कहावत होती है कि लालच के चक्कर में और पैसे बचाने के लिए हाथ काटना, इसका भी सीधा तात्पर्य यही है कि इनका इस्तेमाल भी नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही थोड़े से पैसे बचाने के लालच में भविष्य का बड़ा नुकसान कर लेना। झूठी अर्थव्यवस्था से बचने का मतलब यह है कि आप सिर्फ आज की बचत न देखें, बल्कि उस चीज के पूरे बाजार मूल्य (स्वामित्व की कुल लागत) के रूप में देखें।
प्रति उपयोग लागत का मूल्य निर्धारण
अगर हम किसी भी वस्तु की कीमत को उसकी उपयोगिता से भाग दें। जैसे कि 500 का सस्ता जूता जो 2 महीने चलता है बनाम 2,000 का अच्छा जूता, जो 2 साल चलता है, तो महंगा जूता अधिक सस्ता होगा, वहीं महंगा जूता असल में सस्ता है। इसके अलावा, आप 7 दिन का नियम वाला नियम भी फॉलो कर सकती हैं। अगर आपको कोई चीज 'सस्ती' या 'सेल' में दिख रही है, तो उसे तुरंत नहीं खरीदें, 7 दिन इंतजार करें। अगर 7 दिन बाद भी आपको उसे लेने की जरूरत महसूस हो रही है, तो उसे लें।
कंजूसी सही नहीं

इस बात का ख्याल भी आपको रखना है कि किसी भी तरह की कंजूसी सही नहीं होती है और आपको इसका ख्याल रखना होता है कि कंजूसी से चीजें खराब आती हैं और आपके पैसों की बर्बादी होती है। जैसे कि कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जहां घटिया क्वालिटी लेना खतरनाक या और महंगा हो सकता है, जैसे टायर और जूते, जो आपके लिए किसी दुर्घटना की वजह बन सकते हैं, वहीं इलेक्ट्रॉनिक्स और अप्लायंसेज भी बेहद जरूरी होते हैं और तो और सस्ते गैजेट्स बिजली ज्यादा खाते हैं और जल्दी खराब होते हैं। इसलिए इन चीजों में कोई भी कौताही न बरतें। अगर हम सेहत और भोजन की बात करें, तो टिया क्वालिटी का खाना आगे चलकर भारी मेडिकल बिल दे सकता है। इसलिए इनके लिए फॉल्स इकोनॉमी का सहारा न लें।
इन बातों का रखें ध्यान
आप किसी भी तरह के बहकावे में न जाएं, इसके लिए रिव्यूज और रिसर्च का सहारा लेना अच्छा होता है और एक बात का आपको खास ख्याल रखना चाहिए कि आप सिर्फ डिस्काउंट देखकर न ललचाएं। आपको कुछ भी खरीदने से पहले, अन्य ग्राहकों के अनुभव और उत्पाद की टिकाऊपन (durability) को जांच लें और फिर छुपे हुए खर्चों को भी जोड़ने की कोशिश करें। जैसे कि खरीदने से पहले पूछें कि क्या इसके रखरखाव या साथ में लगने वाली चीजों पर अधिक खर्च तो नहीं आएगा। तभी खरीदें, नहीं तो बेवजह खर्च करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
साइकोलॉजिकल ट्रैप

इस बात का आपको खास ख्याल रखना है कि साइकोलॉजिकल ट्रैप में किसी भी कंपनी के आपको कभी नहीं आना है, क्योंकि कंपनियां यही करती हैं कि आपको फंसाने की कोशिश करेंगी, सस्ती चीजें दिखा कर आकर्षित करेंगी और बाद में आपको महसूस होगा कि आपने इसे क्यों लिया है, इसकी कोई जरूरत तो थी ही नहीं। बिल्कुल कम समय बचा है या आपके लिए यह खास अवसर है, इस तरह के सारे ट्रैप से आपको निकलना जरूरी होगा। विज्ञापन में एक बहुत शानदार और सस्ती चीज दिखाना, लेकिन दुकान या वेबसाइट पर जाने पर उसे 'आउट ऑफ स्टॉक' बताकर आपको महंगा या खराब विकल्प थमा देना, इस तरह के ट्रैप से आपको खुद को बचा कर रखना चाहिए, तो फिर आपको कभी यह परेशानी नहीं होगी। आजकल ऐप्स और वेबसाइट्स पर सब्सक्रिप्शन ट्रैप बहुत आम है। इससे भी बचने की कोशिश करनी चाहिए। अगली बार कुछ भी सस्ता खरीदते समय खुद से एक बार सवाल जरूर करें कि क्या यह चीज 1 साल बाद भी मेरे काम आएगी? अगर जवाब न या शायद है, तो आप समझ जाएं कि आपको खुद को फॉल्स इकोनॉमी से बचाना है।
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