इकत फैब्रिक के बारे में कहा जाता है कि यह हमेशा फैशन में रहेगा। दादी- नानी से लेकर आनेवाली पीढ़ियों के वार्डरोब में भी यह सुंदर, आकर्षक फैब्रिक हमेशा बरकरार रहने वाला है। इसका समृद्ध इतिहास भी इस बात की गवाही भी देता है कि यह कई सौ सालों से भारतीय परिधान का अहम हिस्सा रहा है। आइए जानते हैं इस फैब्रिक के बारे में विस्तार से।
भारत से इंडोनेशिया पहुंची ये कला

इकत शब्द, इंडोनेशिया की भाषा का शब्द है। इंडोनेशिया और जावा की मूल भाषा में इकत का अर्थ धागा या बांधना होता है, इसलिए कई लोगों का मानना है कि इकत का फैशन मूल रूप से इंडोनेशिया से आया है और भारत ने गुजरते वक्त के साथ इसे अपने कपड़ों का अहम हिस्सा बना लिया, हालांकि कुछ इतिहासकार और भारतीय कपड़ों के विशेषज्ञ इस बारे में अलग राय रखते हैं। वे बताते हैं कि इकत का पैटर्न भारतीय परम्परा में कई सौ साल पुराना है। अंजता की गुफाएं इस बात की गवाही देती हैं कि इकत की जड़ें भारत में कितनी गहरी है। अंजता की गुफाएं हजारों साल से भी अधिक पुरानी है और उन गुफाओं के भित्ती चित्रों में इकत पैटर्न देखने को मिल जाता है, जिससे यह बात साबित होती है कि इकत की शुरुआत भारत में ही हुई है। इतिहासकारों की मानें तो भारत में कपड़ा बुनने की परम्परा हजारों साल पुरानी है। मार्कण्डेय पुराण तक में इसका जिक्र है। ऐसे में भारत शुरुआत से ही कपड़ों का आयात दूसरे देशों में भी करता रहा है और इंडोनेशिया और जावा के साथ उसके अच्छे व्यापारिक संबंध रहे हैं और भारत से इकत पैटर्न वहां पहुंचा था। यह 12 वहीं शताब्दी के आस-पास की बात होगी। धीरे-धीरे यह पैटर्न वहां का लोकप्रिय कपड़ो में शुमार हो गया। 18 वीं शताब्दी आते -आते वहां भी भारत की तरह इकत बुनकर केंद्र बन गए।
ताना और बाना के मेल से बनता इकत
इकत में ताना और बाना बहुत महत्वपूर्ण होता है, ताना और बाना शब्दों से हम सब परिचित हैं, लेकिन कम लोग ही इसका अर्थ जानते हैं। ये दरअसल बुनाई करते हुए धागों के नाम हैं, जो धागा करधे पर लगाया जाता है उसे ताना कहते हैं और जो धागा करधे के आरपार जाता है उसे बाना कहते हैं।
कपड़े और रंग समय के साथ बदले

इकत कपड़े को किसी भी कपड़ा फाइबर से बनाया जा सकता है, बशर्ते वह सहजता से डाई किया जा सकता हो। शुरुआत में इकत रेशम और ऊन जैसे फाइबर पर ही उकेरा जाता था, लेकिन बदलते वक्त के साथ रेयॉन, पॉलिएस्टर और कई अन्य सिंथेटिक फाइबर को भी उसी तरह डाई कर लिया जाता है।
कपड़े को रंगने के लिए पहले पारंपरिक रुप से वनस्पति और खनिज पदार्थों से बनाए गए रंगों का ही इस्तेमाल किया झाता था, लेकिन अब कई बुनकर कैमिकल रंगों का इस्तेमाल करने लगे हैं।
पहले कागज फिर धागों पर उतारी जाती है डिजाइन
इकत एक बेहद खास के साथ-साथ मुश्किल कला है। इस जटिल कला का पूरा प्रोसेस काफी डिटेलिंग से भरा होता है। डिजाइन पहले कागज पर उतारी जाती है। इसके बाद डिजाइन को धागों में उतारा जाता है और फिर डिजाइन के अनुसार धागों को रंगा जाता है। इसके बाद धागे को करधे पर चढ़ाकर बुना जाता है और कुशल बुनकरों की मदद से इकत को तैयार किया जाता है।
इकत के तीन प्रकार
इकत तीन तरह के होते है। एकल इकत, बाना इकत और डबल इकत। इन तीनों इकत में डबल इकत की मांग सबसे ज्यादा है। यह सबसे महंगा भी होता है। यह भारत, जापान और इंडोनेशिया में मुख्य तौर पर बनायी जाती है। भारत में गुजरात, ओडिशा और तेलंगाना को इकत का गढ़ माना जाता है।
एकल इकत
यह इकत का सबसे आसान रूप है। इसमें ताने और बाने में से किसी एक में रजिस्ट धागे का इस्तेमाल करता है और उसके बाद बुनाई शुरू की जाती है।
बाना इकत
बाने का धागा सफाई से लगाना चाहिए, ताकि डिजाइन कपड़े पर अच्छी तरह से उभर सकें। इसमें बाने में रजिस्ट डाई किया हुआ धागा लगता है।ताना सादा ही होता है।
दोहरा इकत
दोहरी इकत के कपड़े में ताने-बाने में रजिस्ट डाई किया हुआ धागा होता है। इनके मेल से कपड़े पर डिजाइन उभरती है, इसलिए ताना और बाना दोनों एक साथ सही तरीके से बुने जाते हैं। यह प्रक्रिया सबसे कठिन होती है, जिससे डबल इकत सबसे महंगी भी हो जाती है।
इकत बढ़ाएं फैशन स्टेटमेंट

इकत पुरुषों की तुलना में महिलाओं के कपड़ों में अधिक आम है। समय -समय पर फैशन डिजाइनर्स इसमें और विविधता जोड़ते रहते हैं। इकत के कपड़ों की बात साड़ी से शुरू हो, इससे अच्छी और बात क्या हो सकती है। इकत की साड़ी के बिना वार्डरोब अधूरा सा रहता है। पारंपरिक कपड़ों में इकत साड़ी के अलावा ब्लाउज़, कुर्ती, सलवार सूट में भी खासा लोकप्रिय है।
इकत की कला को सामायिक बनाने के लिए
फैशन उद्योग लगभग हर तरह के कपड़ों पर इकत-पद्धति की रंगाई का उपयोग करता रहता है। यही वजह है कि स्कर्ट, मैक्सी ड्रेस, पैंट, शर्ट्, टॉप से लेकर कॉर्ड सेट तक सभी इस रंग में नसिर्फ रंगे दिखते हैं, बल्कि फैशन में भी खूब रहते हैं। इकत का फैशन सिर्फ हमारे कपड़ों को खूबसूरत बनाने तक ही सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इकत प्रिंट की पोटली, हैंड बैग भी फैशन से जुड़ चुके हैं।
इकत से बढ़ाए घर की खूबसूरती भी
इकत पैटर्न का इस्तेमाल हमेशा से ही वॉल हैंगिंग के तौर पर दीवारों और घरों की खूबसूरती को बढ़ाने के लिए किया जाता रहा है। यही वजह है कि दुनिया भर की दीवारों पर इकत पैटर्न आम है।
- घर को एलीगेंट लुक देना है, तो इकत पैटर्न वाले वॉल पेपर से घर को सजाने से अच्छा तरीका हो सकता है।
- अगर आप अपने घर को जल्द से जल्द अलग लुक देना चाहती हैं, तो रंगीन इकत के कारपेट आपके ड्राइंग रूम से लेकर बेडरूम तक में अलग रंग भर सकते हैं।
-आप बेडशीट, कुशन कवर और पर्दों में भी इकत के मनचाहे लुक को पा सकती हैं, जो घर के हर कोने को एकदम अलग टच देगा।
- इकत का हल्का लेकिन खास इफेक्ट अपने कमरे में शामिल करना चाहती हैं, तो लैम्प शेड से अच्छा विकल्प और क्या हो सकता है।
- आज के दौर में इकत की मांग घर सजाने में इस कदर बढ़ गयी है कि इकत के फर्नीचर भी उपलब्ध हो गए हैं, जो लिविंग रूम को एक क्लासी लुक दे सकते हैं।
इकत की प्रसिद्धि में बॉलीवुड का भी रहा है योगदान

कोई भी फैशन भारतीय एक्टर्स के प्रभाव को नजरअंदाज नहीं कर सकता है। इकत भी इससे अछूता नहीं रहा है। इकत को बॉलीवुड के एक्टर्स द्वारा समय-समय पर बढ़ावा दिया जाता रहा है। सोनम कपूर की ओवरसाइज्ड प्रिंटेड इकत ड्रेस से लेकर दीपिका पादुकोण इकत साड़ी, आलिया भट्ट की इकत ड्रेस और तारा सुतारिया के इकत कॉर्ड सेट तक इन सभी एक्ट्रेसेज ने इकत पहनकर फैशन स्टेटमेंट को न सिर्फ बनाया है बल्कि इकत की लोकप्रियता में अहम योगदान भी दिया है ।
सस्टेनेबल फैशन को भी बढ़ावा
बदलते वक्त के साथ बुनकरों की जगह मशीनों ने ले ली। इसमें कोई दो राय नहीं कि मशीनें इकत के पैटर्न को दोहरा सकती हैं, लेकिन वह इस प्राचीन कला को उस बारीकी से कपड़े पर नहीं उतार पाती है, जिस तरह से बुनकर 'धुंधला' प्रभाव रंगे हुए धागों का दे पाते हैं । हस्तकला जितनी महीन होती है, वह उतनी ही कम धुंधली दिखती है, जिससे ऊंची कीमतों की मांग बढ़ जाती है। भारत में फैशन डिजाइनरों ने शुरू से ही इकत टेक्सटाइल का इस्तेमाल किया है, लेकिन अब फैशन उद्योग के लिए सस्टेनबिलिटी एक अहम जरूरत भी बन गयी है, जो उन्हें बुनकरों से और भी ज्यादा जोड़ जाता है। इसमें बिजली, पानी का भी इस्तेमाल बिल्कुल कम होता है और इसके अलावा कम से कम वेस्टेज भी।