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संस्कृति

मसालों का मसला अगर नहीं सुलझाया, तो नहीं मिलेगा भरपूर स्वाद

टीम Her Circle |  अगस्त 09, 2023

हम भारतीयों का जीवन मसालों और मसलों से भरपूर होता है, जहां हम जीवन के मसलों के हल तो हम जीवनशैली और जीवन के प्रति अपने नजरिये से निकाल लेते हैं, लेकिन अपने जायका को स्वादिष्ट तब तक नहीं बना पाते हैं, जब तक कि हमारे खाने में मसालों का जायका न मिले। तो इसलिए आइए जानते हैं विस्तार से कि मसालों के पीछे क्या इतिहास रहा है और भारतीय संस्कृति में इसका इस्तेमाल किस तरह से होता है। 

इतिहास है पुराना 

दरअसल, मसाला शब्द की उत्पत्ति उसकी प्रजाति से ही मिलती जुलती है, जिसका अर्थ है माल के प्रकार। 1000 ईसा पूर्व तक चीन तथा भारत में जड़ी-बूटियों पर आधारित चिकित्सा प्रणाली की शुरुआत हो चुकी थी। भारतीय मसालों को लोकप्रिय बनाने में मुगल काल के शासकों की भूमिका अहम रही है। रामायण जैसे प्राचीन भारतीय महाकाव्य में लौंग का उल्लेख मिलता है। रोमियों के पास पहली शताब्दी ईसवी में लौंग थी, क्योंकि प्लिनी द एल्डर ने अपने लेखन में उनके बारे में बात की थी। वहीं मध्य युग में यूरोप में सबसे महंगे उत्पादों में मसाले शामिल हो चुके थे, जिनमें काली मिर्च, दालचीनी  जीरा, जायफल, अदरक और लौंग जैसे मसाले प्रमुख रूप से थे। 

दरअसल, उस दौर में मुगल शासक मसालों के बगैर खाना खाते ही नहीं थे। मसालों का उपयोग सिर्फ खाने में नहीं किया जाता था, बल्कि मसालों का व्यापार भी होता था। मसालों को विश्व मंच तक लाने का श्रेय पुर्तगालियों को ही जाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि पुर्तगाल के राज्य के राजस्व का आधे से अधिक हिस्सा भारतीय काली मिर्च और अन्य मसालों से आता था, क्योंकि वो भारत से लेकर विश्व मंच पर इसे बेचा करते थे। दक्षिण में तो मसालों को लेकर हमेशा ही बातें हुई हैं कि यह मसालों का गढ़ माना जाता रहा है। इसके अलावा ब्रिटिश काल की भी भूमिका रही है, क्योंकि वे जब भारत में आते थे, तब वह अपने साथ मसाले लेकर जरूर आते थे। खास बात यह है कि इतना सालों के बावजूद आज भी मसालों को बड़े-बड़े जहाजों में भरकर भेजा जाता है और तकरीबन 10 मिलियन टन से भी अधिक मसालों का उत्पादन किया गया और बाहर विदेश में भी भेजा गया। 

कई रूपों में उपयोग

भारत में मसालों का उपयोग कई तरीकों से किया जाता है। यह साबूत भी इस्तेमाल होता है और पीस कर बनाये गए पाउडर के रूप में भी। भारत में सिर्फ स्वाद बढ़ाने के लिए ही नहीं, बल्कि मसालों का उपयोग कई बीमारियों को दूर भगाने के लिए भी किया जाता है। इनके कई सारे औषधीय गुण हैं, तो मौसम के अनुसार इनका खूब उपयोग किया जाता है। इसका अलावा, यह भी खास बात है कि मसाले हमारे भोजन को भी कई रूपों में संरक्षित करने का काम करते हैं। 

मसालों का शानदार विस्तार 

यह एक दिलचस्प तथ्य है कि मिर्च भारत में उगाई जाने वाली प्रमुख मसाला फसल है, क्योंकि खेती के अंतर्गत लगभग 29 प्रतिशत क्षेत्र मिर्च के लिए होता है, साथ ही साथ भारत में उत्पादित सभी मसालों में मिर्च का योगदान लगभग 37 प्रतिशत है। वहीं जीरा का भारत में उत्पादन कुल मसालों का लगभग 17 प्रतिशत है, हल्दी का योगदान लगभग 10 प्रतिशत है,  तो कुल मसालों में अदरक का योगदान लगभग 8 प्रतिशत है।

काली मिर्च और लौंग  का सबसे ज्यादा उत्पादन कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में होता है और बड़ी लौंग सिक्किम, पश्चिम बंगाल और अरुणाचल प्रदेश में होता है। वहीं अदरक मध्य प्रदेश, कर्नाटक और असम में उगाया जाता है, हल्दी की खेती महाराष्ट्र, तेलांगना, कर्नाटक में की जाती है। धनिया मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, असम, पश्चिम बंगाल में खूब उगाया जाता है। 

किस राज्य में कैसे इस्तेमाल 

आपको गुजराती खान-पान में जहां लाल मिर्च का इस्तेमाल होते हुए अधिक नजर  आएगा, वहीं सरसों का इस्तेमाल बंगाली व्यंजनों में खूब होता है। केरल में करी पत्ताका इस्तेमाल होता है, तो पंजाबी तड़के में हींग होगा ही। सौंफ महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के खानपान में खूब नजर आता है। सौंफ का इस्तेमाल मीठे डिश बनाने के लिए भी किया जाता है। तेज पत्ते का इस्तेमाल हमारे राज्य के कई खाने में खुशबू के लिए किया जाता है, लगभग हर राज्य में इसका इस्तेमाल जरूर होता है। पश्चिम बंगाल में मछली खाने के शौकीन जम कर सरसों का मसाला इस्तेमाल करते हैं, मछली को मेरिनेट करने के लिए इसका इस्तेमाल और ग्रेवी बनाने के लिए इनका खूब इस्तेमाल होता है। इलायची हमारे यहां खुशबू के लिए इस्तेमाल की जाती है, इसका इस्तेमाल हमारे यहां चाय बनाने में और मीठे पकवान बनाने में खूब किया जाता है, मुगलई व्यंजन में तो इसका खूब इस्तेमाल होता है। दाल चीनी, लौंग और बड़ी इलायची का इस्तेमाल भी हर दिन ही किया जाता है, खासतौर से खड़े गरम मसाले के रूप में। जीरा का इस्तेमाल हमारे यहां छौंका लगाने के लिए किया जाता है। जीरा बिहार, उत्तर प्रदेश में लगभग हर सब्जी या भुजिया बनाने से पहले किया ही जाता है। उत्तर प्रदेश, दक्षिण भारत और बिहार में जीरा राइस भी बनाने का खूब चलन हैं। वहीं इन राज्यों में बनने वाले पराठे के लिए आटा गूंथने में अजवाइन और मंगरैला (कलौंजी ) का इस्तेमाल होता है, क्योंकि यह पाचन क्रिया के लिए काफी अच्छा होता है, पकौड़ियों के मिश्रण में भी इसे जरूर डाला जाता है। लाल मिर्च का इस्तेमाल तेलांगना, केरल, मालवाण खाने में खूब किया जाता है। वहीं हल्दी एक ऐसा मसाला है, जो हर राज्य में सब्जी या कोई भी नमकीन चीज बनाने में इस्तेमाल होती ही है, केसर का इस्तेमाल पहाड़ी इलाकों में अधिक होता है। 

मसाले, बिरयानी और नॉन वेज 

बिरयानी और भारत के हर राज्य में बनने वाले नॉन वेज की जो भी वेरायटी बनती है, उनमें मसालों का इस्तेमाल खूब किया जाता है। खासतौर से मुगलई खाने में और बिरयानी में अगर सही तरीके से मसालों का इस्तेमाल न किया जाए, तो पूरा जायका बिगड़ सकता है। 

अन्य देशों में अहमियत 

जहां भारत में अलग-अलग मसालों का उपयोग, तरह-तरह के स्वाद को विकसित करने के लिए किया जाता है, वहीं मेक्सिकन खाने में बोल्ड फ्लेवर के लिए मसालों का उपयोग होता है। चीन में खुशबूदार मसालों का उपयोग होता है।

सात डिबिया स्वाद की 

भारत में अगर आप गौर करें, तो सात डिब्बों वाला मसाला डिब्बा होता ही हैं, जो हर दिन के खाने में इस्तेमाल किया ही जाता है, इन सात डिब्बों में नमक, हल्दी, जीरा पाउडर, कश्मीरी मिर्च, धनिया पाउडर, खड़ा जीरा और गरम मसाला शामिल है। 

पोटली वाले गरम मसाले 

यखनी पुलाव, बिरयानी या खुशबू वाले चावल के लिए पोटली वाले गर्म मसाले, जिनमें जायफल, जावित्री, लौंग, छोटी काली मिर्च और बड़ी इलायची शामिल होती है। ये वाले मसाले खूब इस्तेमाल होते हैं। 

पांच फोरन या पंच फोरन

बिहार और उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा सब्जी बनाने से पहले छौंका दिया जाता है और इसके लिए पंच फोड़न का खूब इस्तेमाल होता है। यह मसालों का एक मिश्रण है, जो दक्षिण एशिया में बहुत लोकप्रिय है। यह विशेष रूप से बंगाल, पूर्वी भारत, बांग्लादेश और दक्षिणी नेपाल में बहुत प्रचलित है। इसका प्रयोग विशेषतः दाल और अचार बनाने में होता है। पंच फोड़न में मुख्य रूप से मेथी दाना, कलौंजी, जीरा, राई और सौंफ बराबर भागों में होते हैं और इन्हें किसी भी सब्जी को बनाने से पहले गर्म तेल में बस थोड़ा सा ही डालना होता है। 

 

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