कारपेट यानी कालीन घर की खूबसूरती बढ़ाने की वजह से एक अहम घर का साजो-समान बन गए हैं। अलग-अलग डिजाइन, आकृति व रंगों के कालीन न केवल घर की शोभा बढ़ाते हैं, बल्कि सर्दियों के मौसम में आपके पैरों को ठंडी फर्श के संपर्क में आने से बचाते हैं, तो बाकी के मौसम में यह पैरों को भी गंदगी से दूर रखते हैं। आइए जानते है इसके बारे में विस्तार से।
कालीन का इतिहास

कारपेट शब्द मध्यकालीन लैटिन शब्द कार्पिटा यानी मोटे ऊनी कपड़े से आता है। विश्व में कारपेट का इतिहास 5000 साल पुराना है। 3000 ईसा पूर्व विश्व में सबसे पहले मिश्र में कालीन बनी थी। भारत की बात करें तो भारत में कालीन निर्माण के श्रेय की शुरुआत कुछ लोग शेरशाह सूरी को देते हैं, तो कुछ बादशाह अकबर को, हालांकि इस बात में कोई दो राय नहीं है कि भारत में कालीन के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा मुगल काल में ही मिला था। 16वीं शताब्दी में जब मुगल बादशाह अकबर ने भारत में शासन संभाला था, तो कुछ कारीगर आगरा आ गए। उन्होंने वहां पर स्थानीय लोगों के लिए कालीन निर्माण की कार्यशाला स्थापित करने और आगरा सहित दिल्ली और लाहौर में भी बुनाई क्षेत्रों की व्यवस्था करने में मदद की। जिससे भारतीय कारीगर भी कालीन बनाने के हुनर को सीख गए। अकबर के बाद दूसरे मुगल, बादशाहों जहांगीर और शाहजहां ने कालीन को भारतीय उद्योग का अहम हिस्सा बना दिया था, जिसकी पूरे विश्व में मांग होती थी।19 वीं सदी आते-आते भारतीय कालीनों की मांग घटती चली गयी खासकर विदेशी बाजारों में। आजादी के बाद खासकर 70 के दशक में अखिल भारतीय कालीन संघ, उसके अध्यक्ष जलील अहमद अंसारी और कपड़ा मंत्रालय की नयी नीतियों और कोशिशों ने भारतीय कालीन उद्योग को एक बार फिर पूरे विश्व में एक खास पहचान दिलायी।
भारत में कालीन बुनाई के प्रकार

भारतीय कालीनों की बुनाई पर गौर करें, तो यह मूल रूप से तीन प्रकार की होती हैं। सबसे पहली किस्म फारसी, जिसमें दो तरीके से बुनाई होती है। इस्फहान और कशान। फारसी इस्फहान किस्म में डिजाइन लंबी पत्ती और फूल हैं। फारसी कशान में पत्ती और फूल की डिजाइन छोटी होती है। फारसी डिजाइनों में आमतौर पर सात से ग्यारह रंगों का उपयोग किया जाता है। कालीन बुनाई की दूसरी किस्म तुर्कमान है।तुर्कमान कालीनों को ज्यामितीय डिजाइनों में बुना जाता है, जिसमें चमकीले लाल, भूरे और हरे रंग का उपयोग किया जाता है, और आमतौर पर इस कालीन के सिरों पर बॉल्स लगे होते हैं। तीसरी किस्म ऑब्यूसन है। इनकी सबसे बड़ी खासियत उनका बड़ा आकार है। वे आम तौर पर अन्य प्रकार के हाथ से बुने हुए कालीन से बहुत बड़े होते हैं। इसकी बुनाई में हल्के रंगों का उपयोग है। अधिकांश ऐसा होता है कि ऑब्यूसन कारपेट में चमकीले रंग के पैटर्न के साथ पेस्टल रंग या सफेद पृष्ठभूमि होती है।
भारत इन राज्यों में होती है विश्व प्रसिद्ध कालीनों की बुनाई

भारत में अमृतसर, आगरा, जयपुर, कश्मीर, एलुरु और वारंगल जैसे स्थानों में उत्तम गुणवत्ता वाले कालीनों का उत्पादन किया जाता है, लेकिन उत्तर प्रदेश में मिर्जापुर-भदोही बेल्ट देश में कालीन बुनाई के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है। यहां कालीन बुनकरों की सबसे बड़ी संख्या है, जो भारत में कालीनों के कुल उत्पादन का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा है। यह दक्षिण एशिया में हाथ से बुने हुए कालीन बुनाई उद्योग का सबसे बड़ा केंद्र है। यही वजह है कि इसे कारपेट सिटी भी कहा जाता है। गौरतलब है कि भदोही का जिक्र अबु फज़ल की आईने अकबरी में भी मिलता है कि बादशाह अकबर एक बार अपनी फौज के साथ इसी रास्ते से गुजर रहे थे। इस दौरान कुछ लोग पीछे ही छूट गए थे तो वे भदोही में ही रुक गए और वहां के स्थानीय लोगों के साथ मिलकर कालीन बनाने की कला भी सीख ली।
इस तरह से होता है कालीन का निर्माण

-एक खूबसूरत कालीन को बनाने की शुरुआत डिजाइन से होती है।
-सुंदर और आकर्षक डिजाइन कागज पर तैयार की जाती है। किस डिजाइन में कौन से रंग भरे जाएंगे। ये भी यही तय हो जाता है। आजकल यह कंप्यूटर पर होने लगा है।
- रंग के साथ साथ यहां पर ये बात भी तय हो जाती है कि ऊन, सिल्क या और कौन सा फैब्रिक कालीन की मेकिंग में लगेगा।
- ऊन और सिल्क या दूसरे फैब्रिक के धागे,जो कारपेट की मेकिंग में लगेंगे, उनकी डाइंग की जाती और फिर उन्हें सुखाया जाता है।
- अब इस डाई किए होंगे धागों को ताने में चढ़ा दिए जाते हैं और बाने से बुनाई होती है। बुनकर कागज में बनी डिजाइन को कालीन पर उकेरते हैं।
- अब बारी कालीन के क्लीनिंग की होती है, यह लगभग एक हफ्ते का पूरा प्रोसेस होता है, जिसमें कालीन को पानी और केमिकल से धोया जाता और फिर उसे दो से तीन दिन धूप में सुखाया जाता है।
- सूख जाने के बाद इसके फिनिशिंग का काम फिर से होता है, जिसके बाद कालीन तैयार है।
- एक कालीन की सुंदरता को प्रति इकाई क्षेत्र में गांठों की संख्या और धागे की डिजाइन, रंग और गुणवत्ता से आंका जाता है। यही वजह है कि एक अच्छी कालीन को बनाने में छह महीने से दो साल तक का वक्त लग जाता है।
कालीन के रख-रखाव से जुड़ी जानकारी

कालीन से घर की खूबसूरती को बढ़ाना हर कोई चाहता है, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि कालीन की खूबसूरती भी बरकरार रहें। आइए जानते हैं इसके रख रखाव से जुड़ी कुछ खास बातें
- कालीन हमारी रोजमर्रा की चीजों में शुमार है, इसलिए इसमें आसानी से दाग लग जाते हैं। जिस भी चीज का दाग लगा हो उसे उससे जुड़े हटाने के नुस्खे से तुरंत साफ करें। दाग को बाद में साफ करेंगे। यह रवैया कारपेट के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
- कारपेट को धूल मिट्टी से दूरी बनाकर रखें। बाहर से आने के बाद गंदे जूतों के साथ कभी कारपेट का इस्तेमाल ना करें। गंदे जूतों को घर के बाहर ही खोलकर आएं। अगर घर में भी आपको स्लीपर पहनने की आदत है, तो घर में पहनने के लिए अलग चप्पलों को रखें।
- हर रूम के लिए अलग-अलग रंगों का सुंदर सा करपेट लाएं और उसे बिछाएं। उस कारपेट को प्रतिदिन अच्छे वैक्यूम क्लीनर से साफ करें। अगर रोजाना कारपेट की सफाई आपके लिए संभव नहीं है, तो कम से कम हफ्ते में दो से तीन बार कारपेट को जरूर क्लीन करें।
- कारपेट को समय समय पर ड्राईक्लीनिंग करवाना भी जरूरी है, क्योंकि इनके भीतर धीरे-धीरे मिट्टी या धूल जमा हो जाता है, जो घर के वैक्यूम क्लीनर से कई बार साफ नहीं हो पाता है, इसलिए आठ से बारह महीने में एक बार कारपेट को ड्राईक्लीन करवाना न भूलें।